विस्तृत उत्तर
द्वितीया तिथि का यमराज से एक अत्यंत विशेष और शाश्वत सम्बन्ध है। शास्त्रीय आधार के अनुसार धर्मशास्त्रों के अनुसार द्वितीया तिथि मात्र पर यमराज का विशेष आधिपत्य रहता है। यह आधिपत्य यमुना और यमराज की पौराणिक कथा से प्रारम्भ होकर शाश्वत रूप ले चुका है।
यमराज कौन हैं, इसका परिचय देखें। यमराज मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी हैं। वे सूर्य-देव के पुत्र हैं। उनकी बहन यमुना भी सूर्य-देव की पुत्री हैं। यमराज धर्म के रक्षक हैं, और वे प्रत्येक जीव के कर्मों का लेखा-जोखा रखते हैं। मृत्यु के बाद जीवात्मा सर्वप्रथम यमराज के सामने जाती है।
द्वितीया तिथि पर यमराज के आधिपत्य का इतिहास इस प्रकार है। पद्म पुराण के अनुसार प्राचीन काल में द्वितीया तिथि के दिन ही देवी यमुना ने अपने भाई यमराज को अपने घर में आदरपूर्वक भोजन कराया था। इस सत्कार से यमराज इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने द्वितीया तिथि को महोत्सर्ग घोषित कर दिया। तब से द्वितीया तिथि यमराज की विशेष तिथि बन गई।
आधिपत्य का अर्थ देखें। आधिपत्य का अर्थ है स्वामित्व, शासन, या विशेष प्रभाव। द्वितीया पर यमराज का आधिपत्य यानी इस तिथि पर यमराज का विशेष प्रभाव और शासन। यह प्रभाव अन्य किसी तिथि पर उतना नहीं होता।
इस आधिपत्य के व्यावहारिक प्रभाव पाँच हैं। पहला प्रभाव है नरक के जीवों को तृप्ति। पद्म पुराण के अनुसार द्वितीया पर नारकीयाश्च तर्पिताः यानी नरक के जीव भी तृप्त होते हैं। दूसरा प्रभाव है पितरों को विशेष राहत। द्वितीया पर श्राद्ध करने से पितरों को यमदूतों की यातना नहीं सहनी पड़ती।
तीसरा प्रभाव है श्राद्धकर्ता को विशेष फल। याज्ञवल्क्य स्मृति 1.264 के अनुसार द्वितीया का काम्य फल कन्यावेदिन और पशू वै है। चौथा प्रभाव है यमदूत भय से मुक्ति। द्वितीया पर श्राद्ध करने से वंशज को स्वयं भी यमदूतों का भय नहीं रहता। पाँचवाँ प्रभाव है ऊर्ध्व लोक प्राप्ति। पितर सरलता से ऊर्ध्व लोकों की ओर गमन करते हैं।
यमराज और श्राद्ध का सम्बन्ध भी विशेष है। यमराज पितरों के स्वामी हैं। जब वंशज श्राद्ध करता है, तो यमराज के आदेश पर ही पितर आते हैं और हवि स्वीकार करते हैं। द्वितीया पर यमराज का आधिपत्य होने से इस दिन का श्राद्ध विशेष प्रभावशाली होता है।
यमराज का द्वितीया पर आधिपत्य और शिव की भूमिका से सम्बन्ध भी है। यमराज शिव के अधीन हैं, क्योंकि शिव महाकाल हैं। जब द्वितीया पर यमराज प्रसन्न होते हैं, तो शिव भी प्रसन्न होते हैं। इसीलिए स्कन्द पुराण में कहा गया है कि द्वितीया श्राद्ध से शिव प्रसन्न होकर कैलास देते हैं।
यमराज और तिथि का सम्बन्ध वैज्ञानिक भी है। चन्द्रमा पितरों का स्वामी है, और द्वितीया चन्द्रमा की दूसरी कला है। यमराज पितरों के स्वामी हैं। चन्द्रमा और यमराज दोनों का पितरों से सीधा सम्बन्ध है। द्वितीया पर चन्द्रमा की दूसरी कला और यमराज का आधिपत्य मिलकर एक विशेष दिव्य संयोग बनाते हैं।
यमराज का द्वितीया से सम्बन्ध पुराणों में विस्तार से वर्णित है। पद्म पुराण में यमुना-यमराज की कथा है। गरुड़ पुराण में यमराज के अधिकार और श्राद्ध के सम्बन्ध का विस्तार से वर्णन है। महाभारत में भी यमराज के धर्म-सम्बन्धी अनेक प्रसंग हैं।
द्वितीया और यमराज के सम्बन्ध का व्यावहारिक उपयोग यह है कि द्वितीया पर श्राद्ध करना यमराज के लिए विशेष सम्मान का भाव है। जो व्यक्ति इस दिन श्राद्ध करता है, वह यमराज को प्रसन्न करता है। प्रसन्न यमराज न केवल उसके पितरों को, बल्कि उस व्यक्ति को भी विशेष कृपा देते हैं।
द्वितीया पर यमराज के आधिपत्य का सम्बन्ध भ्रातृ-प्रेम से भी है। यमुना ने यमराज को जो भ्रातृ-प्रेम दिखाया, वह अद्वितीय था। इस प्रेम से यमराज इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने सम्पूर्ण द्वितीया तिथि को महोत्सव घोषित कर दिया। यानी एक बहन का प्रेम इतना शक्तिशाली है कि उसने मृत्यु के देवता को भी उदार बना दिया।
इस सम्बन्ध का सर्वोच्च संदेश यह है कि प्रेम और श्रद्धा से देवता भी प्रसन्न होते हैं। यमुना की श्रद्धा ने यमराज को प्रसन्न किया। इसी प्रकार, जो वंशज श्रद्धा से द्वितीया पर श्राद्ध करता है, वह यमराज को प्रसन्न करता है, और यमराज की कृपा से उसके पितर सुखी होते हैं। शास्त्रीय आधार के रूप में पद्म पुराण कार्तिक माहात्म्य और गरुड़ पुराण इस सिद्धांत के प्रामाणिक स्रोत हैं। निष्कर्षतः द्वितीया तिथि का यमराज से एक शाश्वत और विशेष सम्बन्ध है। यमराज मृत्यु के देवता और पितरों के स्वामी हैं। यमुना द्वारा यमराज को भोजन कराने से इस तिथि पर उनका विशेष आधिपत्य स्थापित हुआ। इसीलिए द्वितीया पर श्राद्ध करने से पितरों को विशेष राहत और वंशज को विशेष फल मिलता है।
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