विस्तृत उत्तर
यमलोक वह न्याय-क्षेत्र है जहाँ जीवात्मा के कर्मों का निष्पक्ष मूल्यांकन होता है। यमराज की सभा में चित्रगुप्त द्वारा कर्मों का वाचन होने के पश्चात पापी आत्माओं को उनके विशिष्ट पापों के अनुसार अलग-अलग नरकों में भेज दिया जाता है। श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध के अध्याय २६ में २८ प्रमुख नरकों का वर्णन मिलता है, जहाँ भिन्न-भिन्न पापों के लिए कठोर यातनाओं का विधान है। इस प्रकार यमलोक न्याय का केंद्र है और नरक वे दंड-स्थल हैं जहाँ न्याय के बाद पापों का फल भोगना पड़ता है।
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