विस्तृत उत्तर
गरुड़ पुराण में यमराज के स्वरूप का द्वैत वर्णन मिलता है, जिससे स्पष्ट होता है कि जीवात्मा के कर्मों के आधार पर ही यमराज का दर्शन उसे भिन्न-भिन्न रूपों में होता है। जो जीवात्माएँ जीवन भर पाप कर्मों में लिप्त रहती हैं, उन्हें यमराज अत्यंत भयंकर, विशालकाय, कृष्ण वर्ण वाले, लाल नेत्रों वाले और हाथ में मृत्यु-पाश तथा काल-दण्ड धारण किए हुए क्रूर शासक के रूप में दिखाई देते हैं। पापी आत्मा उन्हें देखकर भय से कांपने लगती है और हाहाकार करती है। यमराज का यह स्वरूप कर्म-सिद्धांत का दर्पण है, जहाँ जीवात्मा अपने ही कर्मों की छाया यमराज के स्वरूप में देखती है।
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