विस्तृत उत्तर
यह श्लोक श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कन्ध के चौबीसवें अध्याय के पाँचवें श्लोक (५.२४.५) का अंश है। शुकदेव गोस्वामी राजा परीक्षित को इस श्लोक में भुवर्लोक की निचली और मध्य सीमा का वर्णन करते हैं। 'यावद्वायु: प्रवाति' का अर्थ है 'जहाँ तक वायु (हवा) बहती है' और 'यावन्मेघा उपलभ्यन्ते' का अर्थ है 'जहाँ तक बादल (मेघ) तैरते हुए देखे जा सकते हैं'। इन दोनों की संयुक्त सीमा तक के आकाश को 'अंतरिक्ष' अर्थात भुवर्लोक का निचला हिस्सा कहा गया है। इसके ठीक ऊपर वायु का प्रवाह समाप्त हो जाता है और वहाँ वायुहीन ऊर्ध्व अंतरिक्ष है जो भुवर्लोक का उच्चतर क्षेत्र है जहाँ सिद्ध और विद्याधर निवास करते हैं।
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