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श्रीमद्भगवद्गीता · दैवासुर सम्पद् विभाग योग

श्लोक 23

दैवासुर सम्पद् विभाग योग · Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

मूल पाठ

यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः | न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

जो मनुष्य शास्त्रविधिको छोड़कर अपनी इच्छासे मनमाना आचरण करता है, वह न सिद्धि-(अन्तःकरणकी शुद्धि-) को, न सुखको और न परमगतिको ही प्राप्त होता है।

English Meaning

He who, having cast aside the ordinances of the scriptures, acts under the impulse of desire, attains not perfection, nor happiness nor the Supreme Goal.

He who, having cast aside the ordinances of the scriptures, acts under the impulse of desire, attains not perfection, nor happiness nor the Supreme Goal.

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