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श्रीमद्भगवद्गीता · दैवासुर सम्पद् विभाग योग

श्लोक 9

दैवासुर सम्पद् विभाग योग · Daivasura Sampad Vibhaga Yoga

मूल पाठ

एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः | प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगत्का नाश करनेके लिये ही होता है।

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विस्तृत व्याख्या

गहन भावार्थ और सन्दर्भ

उपर्युक्त (नास्तिक) दृष्टिका आश्रय लेनेवाले जो मनुष्य अपने नित्य स्वरूपको नहीं मानते, जिनकी बुद्धि तुच्छ है, जो उग्रकर्मा और संसारके शत्रु हैं, उन मनुष्योंकी सामर्थ्यका उपयोग जगत्का नाश करनेके लिये ही होता है।

English Meaning

Holding this view, these ruined souls of small intellect and fierce deeds, come forth as the enemies of the world for its destruction.

Holding this view, these ruined souls of small intellect and fierce deeds, come forth as the enemies of the world for its destruction.

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