वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
दाइज दियो बहु भाँति पुनि कर जोरि हिमभूधर कहयो । का देऊँ पूरनकाम संकर चरन पंकज गहि रहयो ॥ सिवें कृपासागर ससुर कर संतोषु सब भाँतिहिं कियो । पुनि गहे पद पाथोज मयना प्रेम परिपूरन हियो ॥
बहुत प्रकारका दहेज देकर, फिर हाथ जोड़कर हिमाचलने कहा- हे शंभु! आप पूर्णकाम हैं, मैं आपको क्या दे सकता हूँ? [इतना कहकर] वे शिवजीके चरणकमल पकड़कर रह गये। तब कृपाके सागर शिवजीने अपने ससुरका सभी प्रकारसे समाधान किया। फिर प्रेमसे परिपूर्णहृदय मैनाने शिवजीके चरणकमल पकड़े [और कहा-] ।
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