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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड छंद 101

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

जननिहि बहुरि मिलि चली उचित असीस सब काहूँ दई । फिरि फिरि बिलोकति मातु तन तब सखी ले सिव पहिं गई ॥ जाचक सकल संतोषि संकर उमा सहित भवन चले । सब अमर हरषे सुमन बरषि निसान नभ बाजे भले ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

पार्वतीजी मातासे फिर मिलकर चलीं, सब किसीने उन्हें योग्य आशीर्वाद दिया। पार्वतीजी फिर-फिरकर माताकी ओर देखती जाती थीं। तब सखियाँ उन्हें शिवजीके पास ले गयीं। महादेवजी सब याचकोंको सन्तुष्ट कर पार्वतीके साथ घर (कैलास) को चले। सब देवता प्रसन्न होकर फूलोंकी वर्षा करने लगे और आकाशमें सुन्दर नगाड़े बजने लगे।

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श्रीरामचरितमानस छंद 101 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik