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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड छंद 102

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

जगु जान षन्मुख जन्मु कर्मु प्रतापु पुरुषारथु महा । तेहि हेतु मैं बृषकेतु सुत कर चरित संछेपहिं कहा ॥ यह उमा संभु बिबाहु जे नर नारि कहहिं जे गावहीं । कल्यान काज बिबाह मंगल सर्वदा सुखु पावहीं ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

षडानन (स्वामिकार्तिक) के जन्म, कर्म, प्रताप और महान् पुरुषार्थको सारा जगत जानता है। इसलिये मैंने वृषकेतु (शिवजी) के पुत्रका चरित्र संक्षेपसे ही कहा है। शिव-पार्वतीके विवाहकी इस कथाको जो स्त्री-पुरुष कहेंगे और गायेंगे, वे कल्याणके कार्यों और विवाहादि मङ्गलोंमें सदा सुख पावेंगे।

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श्रीरामचरितमानस छंद 102 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik