वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
चलि ल्याइ सीतहि सखीं सादर सजि सुमंगल भामिनीं । नवसप्त साजें सुंदरी सब मत्त कुंजर गामिनीं ॥ कल गान सुनि मुनि ध्यान त्यागहिं काम कोकिल लाजहीं । मंजीर नूपुर कलित कंकन ताल गति बर बाजहीं ॥
सुंदर मंगलका साज सजकर स्त्रियाँ और सखियाँ आदरसहित सीताजीको लिवा चलीं। सभी सुंदरियाँ सोलहों श्रृंगार किये हुए मतवाले हाथियोंकी चालसे चलनेवाली हैं। उनके मनोहर गानको सुनकर मुनि ध्यान छोड़ देते हैं और कामदेवकी कोयलें भी लजा जाती हैं। पायजेब, पैंजनी और सुंदर कंकण तालकी गतिपर बड़े सुंदर बज रहे हैं।
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