वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
बैठे बरासन रामु जानकि मुदित मन दसरथु भए । तनु पुलक पुनि पुनि देखि अपनें सुकृत सुरतरु पल नए ॥ भरि भुवन रहा उछाहु राम बिबाहु भा सबहीं कहा । केहि भाँति बरनि सिरात रसना एक यहु मंगलु महा ॥ १ ॥ तब जनक पाइ बसिष्ठ आयसु ब्याह साज सँवारि कै । मांडवी श्रुतकीरति उरमिला कुअँरि लईं हँकारि कै ॥ कुसकेतु कन्या प्रथम जो गुन सील सुख सोभामई । सब रीति प्रीति समेत करि सो ब्याहि नृप भरतहि दई ॥ २ ॥ जानकी लघु भगिनी सकल सुंदरि सिरोमनि जानि कै । सो तनय दीन्ही ब्याहि लखनहि सकल बिधि सनमानि कै ॥ जेहि नामु श्रुतकीरति सुलोचनि सुमुखि सब गुन आगरी । सो दई रिपुसूदनहि भूपति रूप सील उजागरी ॥ ३ ॥ अनुरूप बर दुलहिनि परस्पर लखि सकुच हियँ हरषहीं । सब मुदित सुंदरता सराहहिं सुमन सुर गन बरषहीं ॥ सुंदरीं सुंदर बरन्ह सह सब एक मंडप राजहीं । जनु जीव उर चारिउ अवस्था बिभुन सहित बिराजहीं ॥ ४ ॥
श्रीरामजी और जानकीजी श्रेष्ठ आसनपर बैठे, उन्हें देखकर दशरथजी मनमें बहुत आनंदित हुए। अपने सुकृतरूपी कल्पवृक्षमें नये फल आये देखकर उनका शरीर बार-बार पुलकित हो रहा है। चौदहों भुवनोंमें उत्साह भर गया, सबने कहा कि श्रीरामचन्द्रजीका विवाह हो गया। जीभ एक है और यह मंगल महान है, फिर उसका वर्णन करके वह किस प्रकार समाप्त किया जा सकता है ॥ १ ॥ तब वशिष्ठजीकी आज्ञा पाकर जनकजीने विवाहका सामान सजाकर माण्डवीजी, श्रुतकीर्तिजी और उर्मिलाजी इन तीनों राजकुमारियोंको बुला लिया। कुशध्वजकी बड़ी कन्या माण्डवीजीको, जो गुण, शील, सुख और शोभाकी मूर्ति थीं, जनकजीने प्रेमपूर्वक सब रीतियाँ करके भरतजीको ब्याह दिया ॥ २ ॥ जानकीजीकी छोटी बहिन उर्मिलाजीको सब सुंदरियोंमें शिरोमणि जानकर उस कन्याको सब प्रकारसे सम्मान करके लक्ष्मणजीको ब्याह दिया और जिनका नाम श्रुतकीर्ति है तथा जो सुंदर नेत्रोंवाली, सुंदर मुखवाली, सब गुणोंकी खान और रूप-शीलमें उजागर हैं, उनको राजाने शत्रुघ्नको ब्याह दिया ॥ ३ ॥ दूलह और दुलहिनें परस्पर अपने-अपने अनुरूप जोड़ीको देखकर सकुचाते हुए हृदयमें हर्षित हो रही हैं। सब लोग प्रसन्न होकर उनकी सुंदरताकी सराहना करते हैं और देवगण फूल बरसा रहे हैं। सब सुंदरी दुलहिनें सुंदर दूल्होंके साथ एक ही मंडपमें ऐसी शोभा पा रही हैं, मानो जीवके हृदयमें चारों अवस्थाएँ अपने-अपने स्वामियोंसहित विराजमान हों ॥ ४ ॥
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