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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड छंद 326

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

सनमानि सकल बरात आदर दान बिनय बड़ाइ कै । प्रमुदित महामुनि बृंद बंदे पूजि प्रेम लड़ाइ कै ॥ सिरु नाइ देव मनाइ सब सन कहत कर संपुट किएँ । सुर साधु चाहत भाउ सिंधु कि तोष जल अंजलि दिएँ ॥ १ ॥ कर जोरि जनकु बहोरि बंधु समेत कोसलराय सों । बोले मनोहर बयन सानि सनेह सील सुभाय सों ॥ संबंध राजन रावरें हम बड़े अब सब बिधि भए । एहि राज साज समेत सेवक जानिबे बिनु गथ लए ॥ २ ॥ ए दारिका परिचारिका करि पालिबीं करुना नई । अपराधु छमिबो बोलि पठए बहुत हौं ढीट्यो कई ॥ पुनि भानुकुलभूषन सकल सनमान निधि समधी किए । कहि जाति नहिं बिनती परस्पर प्रेम परिपूरन हिए ॥ ३ ॥ बृंदारका गन सुमन बरिसहिं राउ जनवासेहि चले । दुंदुभी जय धुनि बेद धुनि नभ नगर कौतूहल भले ॥ तब सखीं मंगल गान करत मुनीस आयसु पाइ कै । दूलह दुलहिनिन्ह सहित सुंदरि चलीं कोहबर ल्याइ कै ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

आदर, दान, विनय और बड़ाईके द्वारा सारी बारातका सम्मान कर राजा जनकने महान आनंदके साथ प्रेमपूर्वक लाड़ करके मुनियोंके समूहकी पूजा और वंदना की। सिर नवाकर, देवताओंको मना कर, राजा हाथ जोड़कर सबसे कहने लगे कि देवता और साधु तो भाव ही चाहते हैं; क्या एक अंजलि जल देनेसे कहीं समुद्र संतुष्ट हो सकता है ॥ १ ॥ फिर जनकजी भाईसहित हाथ जोड़कर कोसलराय दशरथजीसे स्नेह, शील और सुंदर प्रेममें सनी हुई मनोहर वाणीसे बोले - हे राजन्! आपके साथ संबंध हो जानेसे अब हम सब प्रकारसे बड़े हो गये। इस राजसाजसहित हम दोनोंको आप बिना दाम लिये हुए सेवक ही जानिये ॥ २ ॥ इन लड़कियोंको परिचारिका जानकर नवीन दयासे पालन कीजिये। मैंने बड़ी ढिठाई की कि आपको यहाँ बुला भेजा, अपराध क्षमा कीजिये। फिर सूर्यकुलके भूषण दशरथजीने समधी जनकजीको सम्पूर्ण सम्मानका निधि बना दिया। उनकी परस्परकी विनय कही नहीं जाती, दोनोंके हृदय प्रेमसे परिपूर्ण हैं ॥ ३ ॥ देवतागण फूल बरसा रहे हैं, राजा जनवासेको चले। नगाड़े, जयध्वनि और वेदध्वनि हो रही है, आकाश और नगर दोनोंमें कौतूहल छाया है। तब मुनीश्वरकी आज्ञा पाकर सुंदरी सखियाँ मंगलगान करती हुई दूलह-दुलहिनोंको कोहबर ले चलीं ॥ ४ ॥

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श्रीरामचरितमानस छंद 326 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik