वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
पुनि पुनि रामहि चितव सिय सकुचति मनु सकुचै न । हरत मनोहर मीन छबि प्रेम पिआसे नैन ॥ ३२६ ॥
सीताजी बार-बार रामजीको देखती हैं और सकुचा जाती हैं, पर उनका मन नहीं सकुचाता। प्रेमके प्यासे उनके नेत्र सुंदर मछलियोंकी छबि को हर रहे हैं ॥ ३२६ ॥
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