वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
जनि लेहु मातु कलंकु करना परिहरहु अवसर नाहीं । दुखु सुखु जो लिखा लिलार हमारे जाइ जहाँ पाउब तहीं ॥ सुनि उमा बचन बिनीत कोमल सकल अबला सोचहीं । बहु भाँति बिधिहि लगाइ दूषण नयन बारि बिमोचहीं ॥
हे माता! कलंक मत लो, रोना छोड़ो, यह अवसर विषाद करनेका नहीं है। मेरे भाग्यमें जो दुःख-सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी। पार्वतीजीके ऐसे विनयभरे कोमल वचन सुनकर सारी स्त्रियाँ सोच करने लगीं और भाँति-भाँतिसे विधाताको दोष देकर आँखोंसे आँसू बहाने लगीं।
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