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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड छंद 98

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं । भोजन करहिं सुर अति बिलंबु बिनोद सुनि सचु पावहीं ॥ जेवंत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परे कहयो । अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहाँ जाको रहयो ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

सब सुंदरी स्त्रियाँ मीठे स्वरमें गालियाँ देने लगीं और व्यंग्यभरे वचन सुनाने लगीं। देवगण विनोद सुनकर बहुत सुख अनुभव करते हैं, इसलिये भोजन करनेमें बड़ी देर लगा रहे हैं। भोजनके समय जो आनंद बढ़ा, वह करोड़ों मुँहोंसे भी नहीं कहा जा सकता। [भोजन कर चुकनेपर] सबके हाथ-मुँह धुलवाकर पान दिये गये। फिर सब लोग, जो जहाँ ठहरे थे, वहाँ चले गये।

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श्रीरामचरितमानस छंद 98 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik