वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि। मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ॥ १ ॥
अर्थ: अक्षरों, अर्थसमूहों, रसों, छन्दों और मंगलोंकी करनेवाली सरस्वतीजी और गणेशजीकी मैं वन्दना करता हूँ॥ १ ॥
बाल काण्ड · Baal Kaand
गारीं मधुर स्वर देहिं सुंदरि बिंग्य बचन सुनावहीं । भोजन करहिं सुर अति बिलंबु बिनोद सुनि सचु पावहीं ॥ जेवंत जो बढ़्यो अनंदु सो मुख कोटिहूँ न परे कहयो । अचवाँइ दीन्हे पान गवने बास जहाँ जाको रहयो ॥
सब सुंदरी स्त्रियाँ मीठे स्वरमें गालियाँ देने लगीं और व्यंग्यभरे वचन सुनाने लगीं। देवगण विनोद सुनकर बहुत सुख अनुभव करते हैं, इसलिये भोजन करनेमें बड़ी देर लगा रहे हैं। भोजनके समय जो आनंद बढ़ा, वह करोड़ों मुँहोंसे भी नहीं कहा जा सकता। [भोजन कर चुकनेपर] सबके हाथ-मुँह धुलवाकर पान दिये गये। फिर सब लोग, जो जहाँ ठहरे थे, वहाँ चले गये।
आगे पढ़ें — बाल काण्ड के सभी पद · श्रीरामचरितमानस