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श्रीरामचरितमानस · बाल काण्ड

बाल काण्ड दोहा 95

बाल काण्ड · Baal Kaand

मूल पाठ

समुझि महेस समाज सब जननि जनक मुसुकाहिं । बाल बुझाए बिबिध बिधि निडर होहु डरु नाहिं ॥ ९५ ॥

हिन्दी अर्थ

सरल भावार्थ

महेश्वर (शिवजी) का समाज समझकर सब लड़कोंके माता-पिता मुसकराते हैं। उन्होंने बहुत तरहसे लड़कोंको समझाया कि निडर हो जाओ, डरकी कोई बात नहीं है ॥ ९५ ॥

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श्रीरामचरितमानस दोहा 95 बाल काण्ड — हिन्दी अर्थ सहित | Pauranik