भद्रा मेधा देवी (महानारायण उपनिषद्) ज्ञान मंत्र
मेधादेवी जुषमाणा न आगाद्विश्वाची भद्रा सुमनस्य माना । त्वया जुष्टा नुदमाना दुरुक्तान् बृहद्वदेम विदथे सुवीराः । त्वया जुष्ट ऋषिर्भवति देवि त्वया ब्रह्माऽऽगतश्रीरुत त्वया । त्वया जुष्टश्चित्रं विन्दते वसु सा नो जुषस्व द्रविणो न मेधे ॥
ऋषि-तुल्य ज्ञान, ब्रह्मविद्या, श्रेष्ठ वाक्-कौशल और प्रज्ञा का पूर्ण विकास 2।
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यह मंत्र क्यों?
ऋषि-तुल्य ज्ञान, ब्रह्मविद्या, श्रेष्ठ वाक्-कौशल और प्रज्ञा का पूर्ण विकास 2।
इस मंत्र से क्या होगा?
ऋषि-तुल्य ज्ञान, ब्रह्मविद्या, श्रेष्ठ वाक्-कौशल और प्रज्ञा का पूर्ण विकास
जाप विधि
महानारायण उपनिषद् वर्णित पूर्ण मेधा सूक्त का नित्य सस्वर पाठ 2।
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स्तुवन्ति ये स्तुतिभिरमीभिरन्वहं त्रयीमयीं त्रिभुवनमातरं रमाम् । गुणाधिका गुरुतरभाग्यभागिनो भवन्ति ते भुवि बुधभाविताशयाः ॥ 31
mool mantraॐ हुं हुं शत्रुस्तम्भनाय हुं हुं ॐ फट्
kavach mantraनासिकां पातु मे लक्ष्मीः कमला पातु लोचनम् ॥ ॐ श्रीं पद्मालयायै स्वाहा वक्षः सदावतु ॥ पातु श्रीर्मम कंकालं बाहुयुग्मं च ते नमः ॥ ओम ह्रीम श्रीम लक्ष्मी नमः चिरकाल तक मेरे पैरों का पालन करें ओम ह्रीम श्रीम नमः पद्माए स्वाहा नितम भाग की रक्षा करें ओम श्रीम महालक्ष्मी स्वाहा मेरे सर्वांग की सदा रक्षा करें ओम ह्रीम श्रीम क्लीम महालक्ष्मी स्वाहा आद्या शक्ति महालक्ष्मी भक्तानुग्रहकारिणी धारके पाठके चैव निश्चला निवसे ध्रुवं तंत्रोक्तम लक्ष्मी कवच संपूर्ण ओम 31
beej mantraऐं
jap mantraॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
tantrik mantraॐ ह्रीं बगलामुखी सर्व दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिव्हां कीलय बुद्धिं विनाशय ह्रीं ॐ स्वाहा