विद्या और ज्ञान के लिए
35 मंत्रॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
गुरु-शिष्य के मध्य ज्ञान का निर्बाध प्रवाह, एकाग्रता, और विद्या में तेजस्वी सफलता की प्राप्ति 20।
श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा ॥
पूर्ण विद्या-सिद्धि, कुशाग्र बुद्धि, और सर्वोच्च ज्ञान-शिखर की प्राप्ति 13।
ज्ञानम् आनंद मयं देवं निर्मल स्पटिकाकृतिम् । आधारं सर्व विद्यानां हयग्रीवं उपास्मे ॥
अज्ञान का समूल नाश, आनंदमयी विद्या की प्राप्ति और स्मरण शक्ति का तीव्र विकास 15।
ॐ श्री हयग्रीवाय नमः ॥
सम्पूर्ण ज्ञान, विवेक और असीम बुद्धि-बल की प्राप्ति 15।
उद्गीथ प्रणवोद्गीत सर्व वागीश्वरेश्वर । सर्व वेदमया चिन्त्यः सर्वं बोधय बोधय ॥
वेदों, उपनिषदों और गूढ़ शास्त्रों का मर्म समझने की आत्मिक क्षमता (Enlightenment) प्राप्त करना 15।
ॐ श्रीं ह्लौं ॐ नमो भगवते हयग्रीवाय विष्णवे मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा ॥
असाधारण प्रज्ञा, मेधा शक्ति और सर्वोच्च बौद्धिक समृद्धि की प्राप्ति 15।
इदं मे ब्रह्म च क्षत्रं चोभे श्रियमश्नुताम् । मयि देवा दधतु श्रियमुत्तमां तस्यै ते स्वाहा ॥
ब्रह्मज्ञान, श्रेष्ठ बौद्धिक ऐश्वर्य और शास्त्रों के गंभीर ज्ञान की प्राप्ति 2।
ॐ अक्षरेस्वराय विद्महे मन्त्रराजाय धीमहि तन्नो हयग्रीवः प्रचोदयात् ॥
मंत्र-सिद्धि, कुशाग्रता और शास्त्रार्थ में अजेय ज्ञान की प्राप्ति 18।
ॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥
बौद्धिक जड़ता का निवारण, वाक्-सिद्धि और उच्च शिक्षा में सफलता 18।
ॐ वागीश्वर्यै विद्महे वाग्वादिन्यै धीमहि तन्नः सरस्वती प्रचोदयात् ॥
शिक्षा एवं करियर में अद्वितीय सफलता तथा प्रज्ञा का प्रकटीकरण 4।
योगीश्वरो महासेनः कार्तिकेयोऽग्निनन्दनः । स्कंदः कुमारः सेनानी स्वामी शंकरसंभवः ॥ गांगेयस्ताम्रचूडश्च ब्रह्मचारी शिखिध्वजः । तारकारिरुमापुत्रः क्रोधारिश्च षडाननः ॥ शब्दब्रह्मसमुद्रश्च सिद्धः सारस्वतो गुहः । सनत्कुमारो भगवान् भोगमोक्षफलप्रदः ॥ शरजन्मा गणाधीशः पूर्वजो मुक्तिमार्गकृत् । सर्वागमप्रणेता च वांछितार्थप्रदर्शनः ॥ अष्टाविंशतिनामानि मदीयानीति यः पठेत् । प्रत्यूषं श्रद्धया युक्तो मूको वाचस्पतिर्भवेत् ॥ महामंत्रमयानीति मम नामानुकीर्तनात् । महाप्रज्ञामवाप्नोति नात्र कार्या विचारणा ॥
महाप्रज्ञा (सर्वोच्च ज्ञान) की प्राप्ति, वाक्-सिद्धि, और मूढ़ता या मंदबुद्धि दोष का निवारण 5।
ॐ नमो भगवते दक्षिणामूर्तये मह्यं मेधां प्रज्ञां प्रयच्छ स्वाहा ॥
अज्ञानता का निवारण, आत्मज्ञान, विलक्षण स्मरण शक्ति और विद्यार्जन में पूर्ण सिद्धि 16।
मेधादेवी जुषमाणा न आगाद्विश्वाची भद्रा सुमनस्य माना । त्वया जुष्टा नुदमाना दुरुक्तान् बृहद्वदेम विदथे सुवीराः । त्वया जुष्ट ऋषिर्भवति देवि त्वया ब्रह्माऽऽगतश्रीरुत त्वया । त्वया जुष्टश्चित्रं विन्दते वसु सा नो जुषस्व द्रविणो न मेधे ॥
ऋषि-तुल्य ज्ञान, ब्रह्मविद्या, श्रेष्ठ वाक्-कौशल और प्रज्ञा का पूर्ण विकास 2।
मेधां म इन्द्रो दधातु मेधां देवी सरस्वती । मेधां मे अश्विनावुभावाधत्तां पुष्करस्रजा । अप्सरासु च या मेधा गन्धर्वेषु च यन्मनः । दैवीं मेधा सरस्वती सा मां मेधा सुरभिर्जुषतां स्वाहा ॥
अप्सराओं और गंधर्वों जैसी तीक्ष्ण मेधा, कला-कौशल में निपुणता और दिव्य स्मरण शक्ति 2।
आ मां मेधा सुरभिर्विश्वरुपा हिरण्यवर्णा जगती जगम्या । ऊर्जस्वती पयसा पिन्वमाना सा मां मेधा सुप्रतीका जुषन्ताम् ॥
ज्ञानरूपी ऊर्जा की प्राप्ति और मस्तिष्क की समस्त क्षमताओं का सर्वांगीण जागरण 2।
प्रज्ञानम् ब्रह्म
ब्रह्मांडीय चेतना और सर्वोच्च ज्ञान स्वरूप का बोध 8।
तत्त्वमसि
जीव और परमतत्त्व की एकता का ज्ञान, अज्ञान-तिमिर का समूल नाश 8।
अहं ब्रह्मास्मि
अविद्या का नाश और स्वयं के विशुद्ध ज्ञान स्वरूप होने की अनुभूति 8।
ॐ ऐं ह्रीं क्लीं महासरस्वती देव्यै नमः ॥
जटिल और कठिन विषयों को सरलता से ग्रहण करने की क्षमता का विकास 4।
यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपासते । तया मामद्य मेधयाऽग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ॥
देवताओं और पितरों के समान श्रेष्ठ मेधा और विलक्षण बुद्धिमत्ता की प्राप्ति 2।
अयमात्मा ब्रह्म
अंतर्निहित पूर्ण ज्ञान और शाश्वत विद्या की जाग्रति 8।
ॐ असतो मा सद्गमय । तमसो मा ज्योतिर्गमय । मृत्योर्मा अमृतं गमय ॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
अज्ञान रूपी अंधकार से शुद्ध ज्ञान रूपी प्रकाश की ओर आत्मिक गमन और सत्य विद्या की प्राप्ति 9।
ॐ भूर्भुवः स्वः । तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
संपूर्ण बुद्धि का प्रकटीकरण (Illumination of Intellect), मेधा-शक्ति की अपार वृद्धि और सत्य ज्ञान की प्रेरणा 10।
ॐ ऐं सरस्वत्यै नमः ॐ ॥
विद्या प्राप्ति में आ रही बाधाओं का निवारण तथा ज्ञान वृद्धि 4।
सरस्वती नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि । विद्यारम्भं करिष्यामि सिद्धिर्भवतु मे सदा ॥
स्मरण शक्ति, एकाग्रता और विद्याध्ययन में निर्विघ्न एवं स्थायी सफलता 4।
या कुन्देन्दुतुषारहारधवला या शुभ्रवस्त्रावृता या वीणावरदण्डमण्डितकरा या श्वेतपद्मासना । या ब्रह्माच्युतशंकरप्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सा मां पातु सरस्वती भगवती निःशेषजाड्यापहा ॥
अज्ञान, मानसिक जड़ता और आलस्य का समूल नाश तथा शुद्ध विद्या की प्राप्ति 4।
शुक्लां ब्रह्मविचारसारपरमामाद्यां जगद्व्यापिनीं वीणापुस्तकधारिणीमभयदां जाड्यान्धकारापहाम् । हस्ते स्फाटिकमालिकां विदधतीं पद्मासने संस्थितां वन्दे तां परमेश्वरीं भगवतीं बुद्धिप्रदां शारदाम् ॥
अज्ञान रूपी अंधकार का नाश और परम कुशाग्र बुद्धि व ज्ञान की प्राप्ति 4।
सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम् । सनिं मेधामयासिषं स्वाहा ॥
'धारणावती मेधा' अर्थात् पढ़ी हुई विद्या को दीर्घकाल तक स्मरण रखने की शक्ति प्राप्त करना 2।
सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने । विश्वरूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोऽस्तु ते ॥
ब्रह्माण्ड में विद्यमान समस्त विद्याओं और सर्वोच्च ज्ञान-सम्पदा की प्राप्ति 4।
वद वद वाग्वादिनी स्वाहा ॥
वाक्-सिद्धि, स्पष्ट उच्चारण, शास्त्रार्थ में विजय और तीव्र ज्ञानार्जन 4।
मेधां मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः । मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहा ॥
समस्त विद्याओं के 'तत्त्वज्ञान' को समझने की सूक्ष्म दृष्टि और कुशाग्रता 2।
ॐ ऐं ह्रीं श्रीं वाग्देव्यै सरस्वत्यै नमः ॥
बुद्धिमत्ता, प्रज्ञा और स्मरण शक्ति का विस्तार 4।
ॐ अर्हं मुखकमलवासिनी पापात्मक्षयंकारी वद वद वाग्वादिनी सरस्वती ऐं ह्रीं नमः स्वाहा ॥
पाप-कर्मों का क्षय, वाणी में शुद्धता एवं प्रभाव, तथा विद्या-ऐश्वर्य की प्राप्ति 4।
ॐ नमो भगवति सरस्वती परमेश्वरी वाग्वादिनी मं विद्यां देहि भगवति हंसवाहिनी हंससमारूढा बुद्धिं देहि देहि प्रज्ञां देहि देहि विद्या परमेश्वरी सरस्वती स्वाहा ॥
मानसिक क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि, तीक्ष्ण प्रज्ञा और विद्या लाभ 4।
महो अर्णः सरस्वती प्रचेयति केतुना । धियो विश्वा विराजति ॥
ज्ञान पिपासुओं के मस्तिष्क और चेतना का दिव्य जागरण एवं प्रकाश 4।