भगवती नारायणी काम्य मंत्र
रक्षांसि यत्रोग्रविषाश्च नागा यत्रारयो दस्युबलानि यत्र। दावानलो यत्र तथाब्धिमध्ये तत्र स्थिता त्वं परिपासि विश्वम्॥
सर्प, चोर, डाकू, अग्नि और जल जैसी विविध प्राकृतिक व मानवनिर्मित विपत्तियों एवं उपद्रवों से रक्षा 28।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
सर्प, चोर, डाकू, अग्नि और जल जैसी विविध प्राकृतिक व मानवनिर्मित विपत्तियों एवं उपद्रवों से रक्षा 28।
इस मंत्र से क्या होगा?
सर्प, चोर, डाकू, अग्नि और जल जैसी विविध प्राकृतिक व मानवनिर्मित विपत्तियों एवं उपद्रवों से रक्षा
जाप विधि
सम्पुटित पाठ अथवा विपत्ति काल में निरन्तर जप 28।
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