श्री विद्या पञ्चदशी (हादि क्रम) सिद्ध मंत्र
क ए ई ल ह्रीं । ह स क ह ल ह्रीं । स क ल ह्रीं ॥
यह त्रिपुर सुंदरी का सबसे गूढ़ मंत्र है जो साधक की कुण्डलिनी ऊर्जा को सीधे जाग्रत करता है 24। इसका उद्देश्य ज्ञान शक्ति का प्रकटीकरण, शिव और शक्ति का पूर्ण तादात्म्य, और जन्म-मरण के चक्र से अंतिम मुक्
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
यह त्रिपुर सुंदरी का सबसे गूढ़ मंत्र है जो साधक की कुण्डलिनी ऊर्जा को सीधे जाग्रत करता है 24। इसका उद्देश्य ज्ञान शक्ति का प्रकटीकरण, शिव और शक्ति का पूर्ण तादात्म्य, और जन्म-मरण के चक्र से अंतिम मुक्ति प्रदान कर साधक को स्वयं ब्रह्मांडीय चेतना में विलीन करना है 25।
इस मंत्र से क्या होगा?
यह त्रिपुर सुंदरी का सबसे गूढ़ मंत्र है जो साधक की कुण्डलिनी ऊर्जा को सीधे जाग्रत करता है 24
इसका उद्देश्य ज्ञान शक्ति का प्रकटीकरण, शिव और शक्ति का पूर्ण तादात्म्य, और जन्म-मरण के चक्र से अंतिम मुक्ति प्रदान कर साधक को स्वयं ब्रह्मांडीय चेतना में विलीन करना है
जाप विधि
यह पञ्चदशी (१५ अक्षरों का) मंत्र तीन कूटों—वाग्भव, कामराज, और शक्ति कूट—में विभाजित है 24। प्रत्येक कूट 'ह्रीं' (माया बीज / हृल्लेखा) पर समाप्त होता है 25। जप के दौरान वाग्भव कूट (अग्नि खंड) का उच्चारण मूलाधार चक्र से आरंभ होकर अनाहत चक्र तक जाता है 25। उच्चारण में ११ मात्राओं के समय का ध्यान रखा जाता है 25। गुरु मुख से प्राप्त कर ही इसका जप किया जाता है 26।
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शंकर
jap mantraॐ ह्रीं ह्रीं वं वं ऐं ऐं मृतसंजीवनि विधे मृतमुत्थापयोत्थापय क्रीं ह्रीं ह्रीं वं स्वाहा
bhakti mantraजय सीता राम जय जय हनुमान
gyan mantraॐ वागीश्वर्यै विद्महे वाग्वादिन्यै धीमहि तन्नः सरस्वती प्रचोदयात् ॥
kavach mantraशम्भुर्मे मस्तकं पातु मुखं पातु महेश्वरः। दन्तपङ्क्तिं च नीलकण्ठोऽप्यधरोष्ठं हरः स्वयम्। कण्ठं पातु चन्द्रचूडः स्कन्धौ वृषवाहनः। वक्षःस्थलं नीलकण्ठः पातु पृष्ठं दिगम्बरः। स्वप्ने जागरणे चैव स्थाणुर्मे पातु सन्ततम्। 8
sabar mantraधन जैसे चुंबक खींचे लोह गोरख की आज्ञा टले नहीं मिटे साधक का मोह कीड़ा जागे पिंगला जागे सुष्मना का खुले द्वार जब तीनों नाड़ी जागे धन आवे बारंबार जैसे गंगा बहे अविरल जैसे सूरज देत उजास वैसे मेरे घर में लक्ष्मी करे सदा ही वास रुका धन चले बंद धन खुले आवे चहुं ओर से धन गोरख का शब्द सांचा रे सांचा रे गुरु का मन काल का भी काल है गोरख तीनों लोक बसेरा जो गोरख का नाम ले साधक उसका होए उजेरा उठ उठ लक्ष्मी आव बैठ मेरे द्वार गोरख की आज्ञा लेकर आव कर मेरा उद्धार शब्द सांचा पिंड कांचा सांची गुरु की बानी हुकुम गोरखनाथ का चले यही नाथ की निशानी 5