अष्टसिद्धि योग (प्राप्ति सिद्धि) सिद्ध मंत्र
ॐ प्रं प्राप्त्यै नमः स्वाहा ।
ब्रह्मांड में किसी भी वस्तु को प्राप्त करने या कहीं भी बिना रोक-टोक के पहुँचने की क्षमता (Teleportation / Unhindered access) 50। यह साधक के मानसिक फोकस को इतना तीक्ष्ण कर देता है कि उसके निर्धारित लक्
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
ब्रह्मांड में किसी भी वस्तु को प्राप्त करने या कहीं भी बिना रोक-टोक के पहुँचने की क्षमता (Teleportation / Unhindered access) 50। यह साधक के मानसिक फोकस को इतना तीक्ष्ण कर देता है कि उसके निर्धारित लक्ष्य स्वतः पूर्ण होने लगते हैं 50।
इस मंत्र से क्या होगा?
ब्रह्मांड में किसी भी वस्तु को प्राप्त करने या कहीं भी बिना रोक-टोक के पहुँचने की क्षमता (Teleportation / Unhindered access) 50
यह साधक के मानसिक फोकस को इतना तीक्ष्ण कर देता है कि उसके निर्धारित लक्ष्य स्वतः पूर्ण होने लगते हैं
जाप विधि
अष्टसिद्धि मंडल साधना के अंतर्गत दक्षिण (South) दिशा की ओर मुख करके उच्चारण किया जाता है 53।
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जामदग्न्य
dhyan mantraमनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्राणनेत्रे। न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥
vaidik mantraॐ इयं वेदिः परो अन्तः पृथिव्या अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः । अयं सोमो वृष्णो अश्वस्य रेतो ब्रह्मायं वाचः परमं व्योम ॥
kavach mantraस्कन्धौ पातु गजस्कन्धः स्तनौ विघ्नविनाशनः । हृदयं गणनाथस्तु हेरम्बो जठरं महान् ॥ धराधरः पातु पार्श्वौ पृष्ठं विघ्नहरः शुभः । लिङ्गं गुह्यं सदा पातु वक्रतुण्डो महाबलः ॥ गणक्रीडो जानुजङ्घे ऊरू मङ्गलमूर्तिमान् । एकदन्तो महाबुद्धिः पादौ गुल्फौ सदाऽवतु ॥ क्षिप्रप्रसादनो बाहू पाणी आशाप्रपूरकः । अङ्गुलीश्च नखान्पातु पद्महस्तोऽरिनाशनः ॥ सर्वाङ्गानि मयूरेशो विश्वव्यापी सदाऽवतु । अनुक्तमपि यत्स्थानं धूम्रकेतुः सदाऽवतु ॥ आमोदस्त्वग्रतः पातु प्रमोदः पृष्ठतोऽवतु । प्राच्यां रक्षतु बुद्धीश आग्नेय्यां सिद्धिदायकः ॥ दक्षिणस्यामुमापुत्रो नैऋत्यां तु गणेश्वरः । प्रतीच्यां विघ्नहर्ताऽव्याद्वायव्यां गजकर्णकः ॥ कौबेर्यां निधिपः पायादीशान्यामीशनन्दनः । दिवाऽव्यादेकदन्तस्तु रात्रौ सन्ध्यासु विघ्नहृत् ॥ 14
navgrah mantraॐ आदित्याय सोमाय मङ्गलाय बुधाय च। गुरु शुक्र शनिभ्यश्च राहवे केतवे नमः॥
jap mantraॐ नमो नृसिंहाय हिरण्यकश्यप-वक्ष-स्थल-विदारणाय त्रिभुवनव्यापकाय भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी कुलोन्मूल नाशाय स्तम्भोद्भवाय समस्तदोषान् हर-हर विसर-विसर पच-पच-हन-हन-कम्पय-कम्पय मथ-मथ ह्रीं ह्रीं फट् फट् एह्येहि रुद्र आज्ञापयति स्वाहा