अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.४) वैदिक मंत्र
ॐ अग्निर्वृत्राणि जङ्घनत् द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥
दुष्ट प्रवृत्तियों (वृत्र) एवं आसुरी शक्तियों का नाश, यज्ञ की रक्षा तथा आध्यात्मिक व भौतिक धन की प्राप्ति।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
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यह मंत्र क्यों?
दुष्ट प्रवृत्तियों (वृत्र) एवं आसुरी शक्तियों का नाश, यज्ञ की रक्षा तथा आध्यात्मिक व भौतिक धन की प्राप्ति।
इस मंत्र से क्या होगा?
दुष्ट प्रवृत्तियों (वृत्र) एवं आसुरी शक्तियों का नाश, यज्ञ की रक्षा तथा आध्यात्मिक व भौतिक धन की प्राप्ति
जाप विधि
यज्ञ में विघ्न-बाधाओं के निवारण हेतु विशेष आहुति के साथ इसका सुमधुर गान किया जाता है।
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