अग्नि / आग्नेय काण्ड (१.१.४) वैदिक मंत्र
ॐ अग्निर्वृत्राणि जङ्घनत् द्रविणस्युर्विपन्यया । समिद्धः शुक्र आहुतः ॥
दुष्ट प्रवृत्तियों (वृत्र) एवं आसुरी शक्तियों का नाश, यज्ञ की रक्षा तथा आध्यात्मिक व भौतिक धन की प्राप्ति।
जप, संकल्प और उपासना संकेत
जप काउंटर लोड हो रहा है...
यह मंत्र क्यों?
दुष्ट प्रवृत्तियों (वृत्र) एवं आसुरी शक्तियों का नाश, यज्ञ की रक्षा तथा आध्यात्मिक व भौतिक धन की प्राप्ति।
इस मंत्र से क्या होगा?
दुष्ट प्रवृत्तियों (वृत्र) एवं आसुरी शक्तियों का नाश, यज्ञ की रक्षा तथा आध्यात्मिक व भौतिक धन की प्राप्ति
जाप विधि
यज्ञ में विघ्न-बाधाओं के निवारण हेतु विशेष आहुति के साथ इसका सुमधुर गान किया जाता है।
विशेष टिप्पणियाँ
अलग-अलग श्रेणियों से
हर श्रेणी से एक चुनिंदा मंत्र — नया खोजें
ॐ ऐं क्लीं सौः
gyan mantraॐ वागीश्वराय विद्महे हयग्रीवाय धीमहि तन्नो हंसः प्रचोदयात् ॥
mool mantraॐ ब्रां ब्रीं ब्रौं सः बुधाय नमः
stotra mantraमहालक्ष्म्यष्टक स्तोत्रं यः पठेद्भक्तिमान्नरः । सर्वसिद्धिमवाप्नोति राज्यं प्राप्नोतिसर्वदा ॥ एककाले पठेन्नित्यं महापापविनाशनम् । द्विकालंयःपठेन्नित्यं धनधान्यसमन्वितः ॥ त्रिकालं यःपठेन्नित्यं महाशत्रुविनाशनम् । महालक्ष्मीर्भवेन्नित्यंप्रसन्न वरदा शुभा ॥ 29
tantrik mantraॐ क्षं पक्ष ज्वाल जिव्हे कराल दंष्ट्रे प्रत्यंगिरे क्षं ह्रीं हुं फट्
sabar mantraझाड़ि झाड़ि कापड़ पिन्दि । वीर मुष्टे बांधि बाल । बुले एलाम मशान भूम होते भैरव। कटार हाते। लोहार बाड़ी। बाम हाते चामदड़ि। आज्ञा दिल राजा चुडं हाते । लोहार किला । मुद्गर धिनि। विगलि घुंडिकार आज्ञे 25