| 1 |
कृष्ण |
कृष्ण शब्द का अर्थ है
“श्याम-वर्ण वाला (गहरे रंग का)”। भागवत पुराण के अनुसार महर्षि गर्ग ने बालक
का नामकरण करते समय कहा था कि चूँकि यह बालक अत्यंत श्याम वर्ण (काला) है,
इसलिए इसका नाम कृष्ण होगा। |
| 2 |
कमलनाथ |
कमलनाथ का अर्थ है
“कमला (देवी लक्ष्मी) के स्वामी”। चूँकि श्रीकृष्ण, भगवान विष्णु के अवतार हैं, वे देवी लक्ष्मी
के पति और परम प्रिय आराध्य हैंnriol.com। इस कारण भगवान का एक नाम कमलनाथ भी है
(कमलापति या लक्ष्मी-कांत)। |
| । |
वासुदेव |
वासुदेव का अर्थ है “वासुदेव
का पुत्र”। श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में वसुदेव-देवकी के यहाँ हुआ, इसलिए उन्हें पुराणों में
वासुदेव कहा गया है। भागवत पुराण में गर्ग मुनि ने बताया है कि पिछले जन्म में भी यह बालक वसुदेव
के पुत्र के रूप में प्रकट हुआ था, अतः जो लोग इस रहस्य को जानते हैं वे इसे वासुदेव कहकर पुकारेंगे। |
| 4 |
सनातन |
सनातन का अर्थ है “शाश्वत, अनादि”।
श्रीकृष्ण को सनातन कहा गया है क्योंकि वे स्वयं परम भगवान हैं जिनका न आदि है न अंत। गीता में अर्जुन
श्रीकृष्ण की स्तुति करते हुए कहते हैं – “आप सनातन परम तत्व हैं, अदि देव तथा अव्यय पुरुष हैं” (भगवद्गीता 11.18)। |
| 5 |
वासुदेवात्मज |
वासुदेवात्मज भी “वासुदेव के पुत्र”
को दर्शाता नाम है (वासुदेव + आत्मज जिसका अर्थ वसुदेव से उत्पन्न)। भागवत पुराण के अनुसार
श्रीकृष्ण ने पूर्व जन्म में वसुदेव के यहाँ जन्म लिया था और इस जन्म में भी वे देवकी-वासुदेव के पुत्र
बने, इसलिए उन्हें वासुदेवात्मज कहा जाता है। |
| 6 |
पुण्य |
पुण्य का अर्थ है “पवित्र या पुण्यस्वरूप”।
श्रीकृष्ण स्वयं पुण्य की मूर्ति हैं – उनके नाम, रूप और चरित्र सर्वथा शुद्ध और पावन हैं। उनके स्मरण मात्र से
पाप नष्ट हो जाते हैं, इसलिए उन्हें पुण्य कहा गया है। |
| 7 |
लीलामानुषविग्रह |
लीला-मानुष-विग्रह का अर्थ है “
जिन्होंने लीला करने हेतु मनुष्य रूप धारण किया”। शास्त्रों में भगवान के अवतारों को लीला अवतार कहा गया है –
श्रीकृष्ण ने भी देवताओं व भक्तों के कल्याण के लिए मानव रूप में अवतार लेकर अनेक दिव्य लीलाएँ कीं। इसीलिए उन्हें
लीला-मानुष-विग्रह कहा जाता है। |
| 8 |
श्रीवत्स-कौस्तुभ-धारी |
श्रीवत्सकौस्तुभधारी अर्थात “वक्षस्थल
पर श्रीवत्स चिन्ह तथा कौस्तुभ मणि धारण करने वाले भगवान”। भागवत पुराण के अनुसार भगवान
विष्णु के रूप में बालक कृष्ण के वक्ष पर श्रीवत्स (लक्ष्मी का चिन्ह) प्रकट था
और गले में कौस्तुभ मणि सुशोभित थी (जन्म के समय कारागार में देवकी-वासुदेव को दर्शन देते समय)।
यही श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप की पहचान है, इसलिए उन्हें श्रीवत्स-कौस्तुभ-धारी कहा जाता है। |
| 9 |
यशोदा-वत्सल |
यशोदा-वत्सल का अर्थ है
“माता यशोदा का दुलारा (वत्सल पुत्र)”। श्रीकृष्ण ने अपने पालन-पोषण के लिए
गोकुल में नंद बाबा एवं यशोदा को माता-पिता माना। भागवत पुराण में वर्णित है कि बाल कृष्ण
अपनी माता यशोदा को अत्यंत प्रिय थे और उनकी बाल-लीलाओं से यशोदा को अपार आनंद मिलता
था। इस मातृस्नेह के कारण उन्हें यशोदावत्सल कहा जाता है। |
| 10 |
हरि |
हरि विष्णु का एक प्रसिद्ध नाम है,
जिसका अर्थ है “जो पाप एवं कष्ट हर लेते हैं”। श्रीकृष्ण को भी भक्तों के पाप-ताप हरने के कारण हरि कहा
जाता है। भागवत में श्रीकृष्ण को प्रकृति के स्वामी रूप में संबोधित किया गया है। साथ ही हरि नाम का
एक अर्थ “सिंह” भी है, जिसमें श्रीकृष्ण का वीर स्वरूप झलकता है। |
| 11 |
चतुर्भुज-धारी |
चतुर्भुजात्त-चक्रासी-गदा-शंखधारी मतलब
“चार भुजाओं वाले (चतुर्भुज) जो चक्र, तलवार, गदा व शंख धारण किए हैं”। भागवत पुराण के अनुसार
भगवान कृष्ण जन्म लेते ही माता-पिता को अपने चतुर्भुज विष्णु रूप में दर्शन देते हैं – उनके
हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म सुशोभित थे। बाद में माता देवकी के प्रार्थना करने
पर वे बालक का रूप धारण कर लेते हैं। अतः श्रीकृष्ण का एक नाम चतुर्भुजधारी भी है। |
| 12 |
देवकीनंदन |
देवकीनंदन का अर्थ है “देवकी का
आनंद (पुत्र)”। चूँकि श्रीकृष्ण का जन्म माता देवकी के गर्भ से हुआ, वे देवकीनंदन कहलाए। कई ग्रंथों में
श्रीकृष्ण को देवकी-सुत (देवकीपुत्र) कहा गया है। उनका यह नाम उनके जन्म की याद दिलाता है,
जब कंस के कारागार में देवकी ने उन्हें जन्म दिया। |
| 13 |
श्रीशय (श्रीनिवास) |
श्रीशय का शाब्दिक अर्थ है “श्री
(लक्ष्मी) जिनमें शयन करती हैं”, अर्थात लक्ष्मी जिन्हें अपना निवास स्थान मानती हैं।
यह भगवान विष्णु का भी एक नाम है। चूँकि श्रीकृष्ण नारायण हैं जिनके हृदय में
श्रीलक्ष्मी विराजमान रहती हैं, वे श्री-निवास या श्रीशय कहलाते हैं। विष्णु सहस्रनाम में भी उन्हें
“श्रीनिवास” कहा गया है – जो देवी लक्ष्मी के आश्रय हैं। |
| 14 |
नन्दगोपाल-प्रियात्मज |
नन्द-गोपाल-प्रियात्मज का अर्थ है
“नंद गोपाल के परम प्रिय पुत्र”। कृष्ण ने जन्म के बाद पालन हेतु गोकुल में नंद बाबा को पिता रूप
में पाया। भागवत पुराण में आता है कि नन्द महाराज को यह बालक अतिप्रिय था और इसके आगमन
से समस्त ब्रजवासियों में आनंद छा गया। इसलिए श्रीकृष्ण नन्द-प्रियात्मज (नंदनंदन) नाम से भी पूजित हैं। |
| 15 |
यमुना-वेग-संहारक |
यमुना-वेग-संहारिणे अर्थ “यमुना
नदी के वेग को थमा देने वाले”। श्रीकृष्ण ने बाल्यकाल में अपनी लीलाओं द्वारा यमुना नदी को
भी नियंत्रित किया। भागवत पुराण के अनुसार जब वसुदेव नवजात कृष्ण को लेकर यमुना पार जा रहे थे,
तब यमुना का उफ़ान बालक के चरण स्पर्श से शांत हो गया। इसी तरह वृंदावन में कालिय-दमन से भी
यमुना निर्मल हुई। अतः उन्हें यमुना-वेग-संहारक कहा जाता है। |
| 16 |
बलभद्र-प्रियानुज |
बलभद्र-प्रियानुज का अर्थ है
“बलराम के प्रिय अनुज (छोटे भाई)”। बलराम जी (बलभद्र) श्रीकृष्ण के बड़े भ्राता थे
और गोकुल में दोनों साथ पले-बढ़े। भगवान कृष्ण अपने अग्रज बलराम के अत्यंत स्नेही छोटे भाई
थे, इसलिए वे बलभद्र-प्रियानुज कहलाते हैं। |
|
पूतना-जीवित-हर |
पूतनाजीवितहर अर्थ “पूतना नामक
राक्षसी का जीवन हर लेने वाले (अर्थात उसे मारने वाले)”। भागवत पुराण (स्कंध 10) में कथा है
कि बालकृष्ण ने जन्म के कुछ समय बाद ही गोकुल में आई दुष्टा राक्षसी पूतना का वध किया था –
पूतना ने विषैले दूध से बालक को मारना चाहा, परंतु श्रीकृष्ण ने स्तनपान के साथ उसका जीवन ही हर लिया
। इस लीला के कारण उन्हें पूतना-जीवितहर कहा जाता है। |
| 18 |
शकटासुर-भंजन |
शकटासुरभञ्जन का अर्थ है
“शकटासुर राक्षस का भंजन (विनाश) करने वाले”। शास्त्रों के
अनुसार शकटासुर नामक असुर बैलगाड़ी (शकट) का रूप धरकर नन्हे कृष्ण
को कुचलने आया था। तब बालकृष्ण ने खेल-खेल में पैर मारकर उस शकट (गाड़ी)
को तोड़ दिया और राक्षस मारा गया। इस घटना से श्रीकृष्ण शकटासुर-भंजन कहे गए। (भागवत पुराण, स्कंध 10)। |
| 19 |
नन्द-व्रज-जनानन्दिन |
नंद-व्रज-जन-आनन्दिन का अर्थ है
“नंद एवं समस्त ब्रजवासियों को आनंद देने वाले”। बालकृष्ण के आगमन से नंदबाबा के व्रज में खुशी
की लहर दौड़ गई थी। भागवत में वर्णन है कि कृष्ण अपनी बाल-लीलाओं से गोकुल-वृंदावन
के लोगों का हर्ष बढ़ाते थे। वे अपने周围 के सभी को आनंदित रखते थे, इसी से
उनका नाम व्रज-जनानन्दन पड़ा। |
| 20 |
सच्चिदानन्द-विग्रह |
सच्चिदानन्द-विग्रह का अर्थ है
“सत् (सत्ता), चित् (चेतना) और आनंद स्वरूप देह वाले”। वैदिक उपनिषदों में परमात्मा को
सच्चिदानन्द रूप बताया गया है – श्रीकृष्ण उसी ब्रह्म के साकार विग्रह हैं। इसलिए भक्ति ग्रंथों में उनका
नाम सच्चिदानन्द-विग्रह (पूर्ण आनन्दमय स्वरूप) प्रसिद्ध है। |
| 21 |
नवनीत-विलिप्तांग |
नवनीत-विलिप्ताङ्ग का अर्थ है
“जिसके अंग नवनीत (मक्खन) से लिपे हुए हैं”। गोकुल में श्रीकृष्ण माखन चुराकर
खाते और अपने शरीर पर भी लगा लेते थे। भागवत पुराण में यशोदा द्वारा कृष्ण को मक्खन
चुराते हुए रंगे हाथ पकड़ने की कहानी आती है, जब उनके मुख पर नवनीत लगा हुआ
था। इसी से बालकृष्ण का नाम माखनचोर और नवनीत-विलिप्तांग प्रचलित हुआ। |
| 22 |
नवनीत-नटन |
नवनीत-नटन का अर्थ है “मक्खन
के लिए नृत्य करने वाले”। यह नाम श्रीकृष्ण की एक बाल-लीला से जुड़ा है। गोकुल में माँ
यशोदा बालकृष्ण को दही-मक्खन तभी देती थीं जब वह हास्यकर नृत्य करते थे। कुछ
कथाओं में आता है कि मक्खन पाने के लिए नन्हे कान्हा ने नृत्य किया और अपने
प्रेम से सबका मन मोह लिया। इस अद्भुत लीला के कारण उन्हें नवनीत-नटन कहा जाता है। |
| 23 |
अनघ |
अनघ का अर्थ है “निर्दोष, निष्पाप”
(जिसमें कोई पाप-दोष न लगे)। विष्णु सहस्रनाम में अनघ नाम आता है, जिसका अर्थ है जिसे कोई
पाप स्पर्श नहीं करता
। श्रीकृष्ण पूर्ण परमात्मा हैं – उनमें कोई त्रुटि या पाप नहीं, उनके सभी कर्म दिव्य हैं। इसीलिए उन्हें अनघ
अर्थात सर्वथा पापरहित कहा गया है। |
| । |
मुचुकुन्द-प्रसादक |
मुचुकुन्द-प्रसादक का अर्थ है
“राजा मुचुकुन्द को अनुग्रह (प्रसाद) देने वाले”। भागवत पुराण में कथा है कि
द्वापर युग में राजा मुचुकुन्द ने देवताओं के लिए युद्ध किया था और वरदानस्वरूप लंबी
निद्रा ली थी। बाद में मथुरा पर आक्रमण के समय श्रीकृष्ण उस गुफा में गए जहां
मुचुकुन्द सो रहे थे और उन्हें दर्शन देकर उनका कल्याण किया। भगवान की कृपा से मुचुकुन्द
ने मोक्ष मार्ग ग्रहण किया। तभी से श्रीकृष्ण मुचुकुन्द-प्रसादक कहलाए। |
| 25 |
षोडशस्त्री-सहस्रेश |
षोडश-स्त्री-सहस्रेश का अर्थ है
“16 हजार स्त्रियों के स्वामी”। शास्त्रों में वर्णित है कि श्रीकृष्ण ने नरकासुर को पराजित
कर उसके कैद से 16,100 कन्याओं को मुक्त कराया और समाज में उनका सम्मान
बनाए रखने हेतु सभी से विवाह कियाnriol.com। इसके अतिरिक्त उनकी प्रधान पत्नी
रुक्मिणी और अन्य कुल 8 पटरानियाँ थीं। इस प्रकार वे 16 सहस्र से अधिक रानियों के पति हैं
और षोडशस्त्री-सहस्रेश नाम से विख्यात हैं। |
| 26 |
त्रिभङ्गी |
त्रिभंगी (त्रिभंग-ललित) का
अर्थ है “तीन स्थानों से मुड़े हुए मनोहर रूप वाले”। श्रीकृष्ण के मुरलीधर स्वरूप
को त्रिभंग मुद्रा में दर्शाया जाता है – उनका शरीर कमर, गर्दन और पैर पर तीन जगह से मोहक
ढंग से झुका होता है। यह उनकी विशिष्ट नृत्य-मुद्रा है। भागवत आदि ग्रंथों में गोपियाँ उनके तीनभंग-सुंदर
अंग का वर्णन करती हैं। अतः वे त्रिभंगीललित कहे जाते हैं। |
| 27 |
मधुराकृत |
मधुराकृत का अर्थ है
“जिसकी आकृति (रूप) अति मधुर है”। श्रीकृष्ण साक्षात सुंदरता की मूर्ति हैं – उनके रूप
को शास्त्रों ने मधुरतम (अत्यंत मनोहर) कहा है। श्रीमद भागवत में वृंदावन की गोपियाँ
कृष्ण के रुप-सौंदर्य का वर्णन करती हैं कि उनका रूप और बंसी की तान मधुरता की
पराकाष्ठा है। इस अद्भुत मधुर रूप के कारण भगवान को मधुराकृत नाम से भी पुकारा जाता है। |
| 28 |
शुकवाक-अमृताब्धि-इन्दु |
शुक-वाक्य-अमृत-अब्दि-इन्दु का
अर्थ है “शुकदेव के वचनों रूपी अमृत-सागर के चंद्रमा”। भागवत कथा के विवेचन में कहा गया है
कि राजा परीक्षित को कथा सुनाते समय श्री शुकदेव ने कृष्ण के गुणों को अमृत-सागर
कहा और स्वयं श्रीकृष्ण को उस अमृत सागर का चंद्रमा बताया। भाव यह कि श्रीकृष्ण की कथाएँ
अमृतमयी हैं और वे स्वयं अमृत के समुद्र को शोभित करने वाले चंद्रमा के समान हैं। |
| 29 |
गोविन्द |
गोविन्द नाम के दो मुख्य अर्थ हैं –
“गो (गाय) को आनंद देने वाले पालक” तथा “इंद्रियों को तृप्त करने वाले”। श्रीकृष्ण
गोकुल में गोपाल (गोपालनकर्ता) थे और गायों व समस्त प्रकृति को आनंद देते थे। हरिवंश पुराण
में वर्णन है कि गोवर्धन पर्वत उठाने के उपरांत देवराज इंद्र ने प्रसन्न होकर कृष्ण का दुग्धाभिषेक किया और
उनका नाम गोविन्द रखा, क्योंकि उन्होंने गो-समुदाय की रक्षा की थी। तभी से वे गोविन्द (गोपियों के भी आराध्य) कहे गए। |
| 30 |
योगिनां पति (योगेश्वर) |
योगिनां पति का अर्थ है
“समस्त योगियों के स्वामी”। गीता में संजय भगवान श्रीकृष्ण को योगेश्वर कहते हैं – अर्थात योग के स्वामी।
भगवद्गीता १८.७८ में घोषणा है: “जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं वहाँ सफलता, विजय और सद्गुण
सुनिश्चित हैं”। भगवान योगमार्ग एवं भक्तिमार्ग के प्रवर्तक हैं, अतः वे योगेश्वर तथा योगियों के ईश्वर कहलाते हैं। |
| 31 |
वत्सवताचार (वत्सवटिचर) |
वत्स-वाटी-चर का अर्थ है
“जो बछड़ों को चराते हुए इधर-उधर घूमते हैं”। बाल कृष्ण गोकुल में गौओं के साथ-साथ बछड़ों
के भी रक्षक थे। भागवत पुराण में वर्णित है कि नन्हे कान्हा अपने सखाओं संग बछड़ों को वन में
चराने ले जाते थे। इस प्रेमपूर्वक गोपालन लीला के कारण उन्हें वत्सपाल तथा वत्सवाटीचर कहा गया –
अर्थात् बछड़ों के भी चरवाहे। |
| 32 |
अनंत |
अनंत का अर्थ है “जिसका
आदि या अंत न हो, अपरिमित”। श्रीकृष्ण स्वयं परमब्रह्म हैं जो काल, स्थान और वस्तु की
सीमाओं से परे हैं – इसीलिए उन्हें अनंत कहा जाता है। गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन
से कहते हैं, “मेरा प्राकट्य और कर्म दिव्य हैं, उन्हें जानकर भक्त मेरे अनंत
स्वरूप को प्राप्त होते हैं” (गीता 4.9)। विष्णु सहस्रनाम में भी अनन्त
नाम आता है जिसका तात्पर्य है परमेश्वर की अनंत महिमा। |
| 33 |
धेनुकासुर-मर्दन |
धेनुकासुर-मर्दन अर्थ
“धेनुकासुर नामक दैत्य का मर्दन (संहार) करने वाले”। भागवत पुराण (10 स्कंध)
में वृंदावन की तलवन लीला आती है – धेनुकासुर नामक राक्षस गधे (गर्दभ) का रूप
धर तालवन में रहता था। श्रीकृष्ण और बलराम ने बछड़ों के साथ उस वन में प्रवेश
किया तो धेनुकासुर ने आक्रमण किया। तब बलराम ने उसे पकड़कर भूमि पर पटक दिया और
श्रीकृष्ण ने उसके साथी असुरों का संहार कियाnriol.com। इस कारण भगवान धेनुकासुर-मर्दन कहलाए। |
| 34 |
त्रिणावर्त-त्रिणीकृत |
त्रिणीकृत-त्रिणावर्त का अर्थ है
“त्रिणावर्त नामक बवण्डर असुर को तृण के समान नष्ट कर देने वाले”। भागवत पुराण की कथा
है कि त्रिणावर्त नामक एक असुर आँधी (बवंडर) बनकर बाल कृष्ण को उठाकर आकाश में ले गया था।
तभी बालकृष्ण ने भारी भार बनकर उसके गले को जकड़ लिया, जिससे घुटकर त्रिणावर्त जमीन
पर आ गिरा और मर गया। इस प्रकार भगवान ने उसे तिनके की भांति परास्त किया,
इसलिए वे त्रिणीकृत-त्रिणावर्तहन कहलाते हैं। |
| 35 |
यमलार्जुन-भंजन |
यमलार्जुन-भंजन अर्थ “दो
यमलार्जुन वृक्षों को उखाड़ देने वाले”। यह श्रीकृष्ण की प्रसिद्ध दमोदर लीला से सम्बंधित नाम है।
भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 10) में आता है कि माता यशोदा द्वारा ऊखल से बाँध
दिए गए नन्हे कृष्ण ने रस्सी से बँधे ऊखल को घसीटते हुए नंदभवन के आँगन में खड़े दो
जुड़वा अर्जुन वृक्षों के बीच ले गए। ऊखल अटकने से जोर पड़ा और दोनों बड़े अर्जुन वृक्ष
जड़ से उखड़कर गिर पड़े। इन वृक्षों में स्थित दो देवता (नलकूबर-मणिग्रीव)
को मोक्ष मिला। इस घटना से भगवान यमलार्जुन-भंजन कहलाए। |
| 36 |
उत्ताल-ताल-भेदी |
उत्ताल-ताल-भेद्री
(या तालभेत्तृ) का अर्थ है “ऊँचे ताड़ वृक्षों को भेदने (तोड़ने) वाले”। यह नाम भी
धेनुकासुर की घटना से जुड़ा है। श्रीकृष्ण-बलराम जब तलवन में गए तो वहाँ
धेनुकासुर को मारने के उपरांत उन्होंने कई बड़े ऊँचे ताड़ (ताल) वृक्षों को खेल-खेल में गिरा दिया। बलराम के
एक झटके से ताल-वृक्षों का समूह धराशायी हो गया था। उस पराक्रम के संदर्भ में भगवान को तालभेदी या उत्तालताल-भेत्रे कहा जाता है। |
| 37 |
तमाल-श्यामल-कृत |
तमाल-श्यामल-कृत का अर्थ है
“जो तमाल वृक्ष के समान श्याम (काले नीले) रंग के हैं”। भागवत सहित अनेक ग्रंथों में श्रीकृष्ण
के रूप-रंग की तुलना तमाल नामक वृक्ष से की गई है – तमाल वृक्ष का तना वर्षाकाल के
मेघ जैसा गहरा नीला-काला होता है। वृंदावन की गोपियाँ कहती हैं: “श्यामसुंदर के अंग बादल
की तरह साँवले हैं, मानो तमाल वृक्ष की छाया”nriol.com। इसी उपमान से उनका नाम
श्यामसुंदर और तमालश्यामल-कृत पड़ा। |
| 38 |
गोपा-गोपीश्वर |
गोपा-गोपीश्वर का अर्थ है
“गोप (ग्वाल) और गोपियों के ईश्वर (स्वामी)”। गोकुल-वृंदावन में श्रीकृष्ण बाल-ग्वालों (सखाओं)
के परम प्रिय तारणहार थे और युवा अवस्था में गोपियों के इष्ट देव थे। वे सब गोप-गोपिकाओं के
जीवन के केन्द्र थे। इसलिए भक्ति साहित्य में उन्हें गोपेश्वर, गोपीनाथ (गोपियों के स्वामी) भी कहा गया।
भागवत में उद्धव श्रीकृष्ण की भक्ति में रत गोपियों को प्रणाम करते हुए कहते हैं कि गोपिकाओं ने
गोविंद को अपना सर्वस्व ईश्वर मान लिया थाnriol.com – इस प्रकार कृष्ण गोप-गोपेश्वर ठहरे। |
| 39 |
योगी (योगेश) |
योगी यहाँ परम योगेश्वर के अर्थ में है –
“जो सर्वोच्च योग सिद्धियों के स्वामी हैं”। श्रीकृष्ण को महर्षि व्यास ने योगेश्वर कहा है क्योंकि वे दिव्य योग-शक्ति
से युक्त परमात्मा हैं। महाभारत में भी कहा गया है कि भगवान श्रीकृष्ण समस्त विद्याओं, योगों और
कलाओं में निपुण थे, कोई उनसे बढ़कर ज्ञानी योगी नहीं। अर्जुन ने गीता उपदेश के बाद कृष्ण
को परम ब्रह्म और सनातन देव कहकर उनकी योगमाया को प्रणाम किया। अतः श्रीकृष्ण योगियों में श्रेष्ठ योगी हैं। |
| 40 |
कोटि-सूर्य-समप्रभ |
कोटि-सूर्य-समप्रभ का अर्थ है
“करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले”। श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप की आभा असंख्य सूर्यों के तेज के
समान वर्णित की गई है। महाभारत में भगवद्गीता (अध्याय 11) में जब अर्जुन को विष्वरूप दर्शन हुआ,
तो उसका तेज हज़ारों सूर्यों के एक साथ उदय होने के समान था। उसी प्रसंग से प्रेरित यह नाम बताता है
कि भगवान की दिव्य कान्ति असीम है – अतः वे कोटि-सूर्य-समप्रभ (अत्यन्त देदीप्यमान) हैं। |
| 41 |
इळापति (इलापति) |
इला का अर्थ पृथ्वी या ज्ञान की देवी
(सरस्वती) भी होता है, तथा पति अर्थ स्वामी। इळापति का भावार्थ “ज्ञान एवं धरती के स्वामी” है।
श्रीकृष्ण को वेदों का अधिष्ठाता कहा गया – भगवद्गीता में वे कहते हैं “सभी वेदों का सार मैं हूँ”
(गीता 15.15)। वे परम ज्ञानी तथा समस्त लोकों के भी ईश्वर हैं। इसी लिए उन्हें इळापति
(या भूरि-श्रवा) नाम से संबोधित किया जाता हैnriol.com। |
| 42 |
परम-ज्योति |
परस्मै ज्योतिषे अर्थात “परम प्रकाश” –
यह श्रीकृष्ण का ब्रह्मस्वरूप दर्शाता नाम है। उपनिषद कहते हैं परमात्मा स्वयं प्रकाशमान है और जगत को प्रकाश
देने वाला है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं: “वह परमात्मा प्रकाश स्वरूप है, ज्ञान
से जानने योग्य है, वह सबके हृदय में ज्योति रूप से स्थित है”। इस तरह कृष्ण परम-ज्योति हैं –
ज्ञान और चेतना के परम प्रकाश। |
| 43 |
यदुवेंद्र |
यदुवेंद्र का अर्थ है
“यदुवंश के अधिपति (यदु कुल के राजा)”। श्रीकृष्ण यदु कुल (यदुवंशी क्षत्रियों) में उत्पन्न हुए –
वे शकंरों के वंशज, यादवों के नेता बने। महाभारत काल में श्रीकृष्ण ने यदुवंशी भोज, वृष्णि
आदि कुलों को द्वारका में एकत्र किया और उनकी रक्षा की। वे यादवों के सर्वमान्य नायक थे, इसलिए
उनका नाम यदुवीर, यदुनाथ और यदुवेंद्र प्रसिद्ध हुआ। |
| 44 |
यदूद्वह |
यदूद्वह का अर्थ है “यदुओं (यादवों)
का वाहक या नेता”। यदूद्वह शब्द महाभारत में कई बार श्रीकृष्ण के लिए प्रयुक्त हुआ है –
क्योंकि कौरव-पांडव युद्ध में श्रीकृष्ण ने पांडवों का साथ देकर समस्त यदुवंशी सेना (नारायणी सेना)
को कौरव पक्ष में भेज दिया था। एक प्रकार से वे सम्पूर्ण यादव कुल को आगे बढ़ाने वाले हैं श्रीमद भागवत
में भी उन्हें यादव-प्रमुख कहा गया है। इस आधार पर उनका नाम यदूद्वह (यदु-ध्वज) है। |
| 45 |
वनमाली |
वनमाली का अर्थ है “वनमाला धारण करने
वाले”। भगवान विष्णु/कृष्ण को वनमाला या वैजयंतीमाला प्रिय है – यह पाँच प्रकार के वन
पुष्पों से बनी माला है जो उनके गले में सुशोभित रहती हैnriol.com। वृंदावन में श्रीकृष्ण
वनफूलों की माला धारण करते थे। इसलिए भक्त उन्हें वनमाली कहते हैं। इस नाम का
उल्लेख विष्णु सहस्रनाम में भी मिलता है (“वनमाली वेगवान्” – वनमाला धारी, तीव्रगामी)। |
| 46 |
पीतवसन |
पीतवसन या पीताम्बर
का अर्थ है “पीले वस्त्र धारण करने वाले”। श्रीकृष्ण के वस्त्रों का रंग पीत (पीला) होने
के कारण उनका एक नाम पीताम्बरधर भी है। भागवत में वर्णन मिलता है कि बालकृष्ण
पीले रेशमी वस्त्र पहनते थे और उनका यह परिधान जगत में विख्यात है। कृष्ण
को चित्रों/प्रतिमाओं में प्रायः पीताम्बर पहने दिखाया जाता है – यह उनकी
ऐश्वर्य-मुद्रा का द्योतक है। |
| 47 |
पारिजातापहारक |
पारिजातापहारक का
शाब्दिक अर्थ है “पारिजात वृक्ष को हर लाने (चुराने) वाले”। द्वारका लीला में प्रसंग
आता है कि इंद्राणी का पारिजात वृक्ष स्वर्ग में था, जिसे श्रीकृष्ण इंद्र से पारिजात
लेकर द्वारका ले आए। हरिवंश पुराण में वर्णित है कि श्रीकृष्ण ने अपनी पत्नी
सत्यभामा की इच्छा पूर्ण करने हेतु अमरपर्वत से पारिजात का वृक्ष ले जाकर
द्वारका की बारी में रोपाnriol.com। इस लीला से वे पारिजात-अपहारक
(स्वर्ग से पारिजात लाने वाले) कहलाए। |
| 48 |
गोवर्धनधारी (गिरिधर) |
गोवर्धनाचलोधर्तृ अर्थ
“गोवर्धन पर्वत को धारण करने वाले”। श्रीमद भागवत (स्कंध 10 अध्याय 25) के अनुसार
इंद्र के कोप से ब्रज को बचाने हेतु श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण गोवर्धन पर्वत अपनी कनिष्ठ उँगली
पर उठा लिया था। सात दिन तक निरंतर पर्वत धारण कर इंद्र के वज्रपात एवं वर्षा से
गोकुलवासियों की रक्षा की। तब देवराज इंद्र ने उनकी महिमा स्वीकार की।
इस अद्भुत लीला के कारण भगवान का नाम गोवर्धनधारी (या गिरिधर) प्रसिद्ध हो गया। |
| 49 |
गोपाल |
गोपाल का अर्थ है
“गायों का पालन करने वाला” (गो-पालक)। बाल्यकाल में श्रीकृष्ण का मुख्य कार्य गौचारण था
– वे गायों को चराने वन में ले जाते, उनकी रक्षा करते तथा उन्हें प्रेमपूर्वक नाम लेकर
पुकारते। यही कारण है कि भक्तजन उन्हें स्नेह से गोपाल कहते हैं।
भगवद्गीता में अर्जुन ने भी श्रीकृष्ण को “गोविन्द” कह कर संबोधित किया है –
गोविंद/गोपाल वही जो गायों और इन्द्रियों को आनंद देता है। |
| 50 |
सर्वपालक |
सर्वपालक का अर्थ है
“सबका पालन करने वाला”। श्रीकृष्ण न केवल गायों का बल्कि सम्पूर्ण प्राणियों एवं भक्तों का
पालन-पोषण करते हैं। वे जगत के रक्षक हैं – गीता में वे स्वयं को “पिता, माता, भर्ता”
(पालने वाला) बताते हैं। महाभारत में विदुर कहते हैं कि नारायण सृष्टि के मूलपालक हैं,
सब उन्हीं पर आश्रित हैं। इसीलिए भगवान का नाम सर्वपालक (सर्वभूत-पालक)
है। |
| 51 |
अजेय |
अजेय का अर्थ है
“जिसे कोई जीत न सके (अजेय)”, अथवा “जन्म-मृत्यु के विजेता”।
श्रीकृष्ण को अजित और अजेय इसलिए कहा गया है क्योंकि समस्त बल,
पराक्रम, विजय उनके अधीन है। महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण की शक्ति के
आगे महान योद्धा भी परास्त हुए। स्वयं भगवान ने कहा है – “मुझे कोई भौतिक
शक्ति परास्त नहीं कर सकती”। वे जन्म-मरण के चक्र से परे हैं,
अतः अजन्मा तथा अजेय हैं। |
| 52 |
निर्जन (निर्जन) |
निर्जन (निर्ञन/निरंजन)
का अर्थ है “निर्मल, निष्कलंक” (जिसमें कोई मलिनता न हो)। श्रीकृष्ण
को निरंजन इसीलिए कहते हैं क्योंकि उन पर माया का कोई आवरण नहीं है –
वे पूर्ण शुद्ध चेतना स्वरूप हैं। शास्त्र कहते हैं परमात्मा निर्गुण, निरंजन है अर्थात
उसमें त्रिगुणों का विकार नहीं लगता। भगवान की लीलाएँ भी निज-माया से परे होकर पवित्र हैं,
इस हेतु उनका नाम निर्जन/निरंजन हुआ। |
| 53 |
कामजनक |
कामजनक का अर्थ है
“संसारी मन में काम (आकर्षण) उत्पन्न करने वाले”। यह नाम भगवान की मोहिनी
लीला की ओर संकेत करता है। श्रीकृष्ण की रूप-माधुरी ऐसी है कि केवल मनुष्य ही नहीं,
देवतागण एवं स्वयं कामदेव (प्रेम के देवता) भी उनसे आकृष्ट हो जाते हैं। भागवत में
वृंदावन की गोपियाँ कहती हैं कि कृष्ण की मोहक मुस्कान और मुरली की धुन से
हमारे मन में प्रभु के प्रति प्रबल आकर्षण (प्रेम) पैदा हो गया है जिसे हम रोक नहीं
सकतीं। इस प्रकार कृष्ण कामजनक हैं – दिव्य प्रेम जगाने वाले। |
| 54 |
कंजलोचन |
कंजलोचन अर्थ
“कमल जैसे नेत्रों वाले (कमल-नयन)”। भगवान श्रीकृष्ण के नेत्र विशाल और सुंदर
कमल-पंखुड़ी के समान बताए गए हैंnriol.com – इसलिए एक नाम कमलनयन भी
प्रचलित है। भगवद्गीता में अर्जुन उन्हें “कमलपत्राक्ष” कहते हैं, वहीं भागवत में
गोपियाँ उनके नयन को लाल कमल के सदृश बताती हैं। अतः कृष्ण को उनके अनुपम
नेत्र-सौंदर्य के कारण कंज-लोचन (पद्माक्ष) कहा जाता है। |
| 55 |
मधुसूदन (मधुघ्न) |
मधुघ्ने का शाब्दिक अर्थ है
“दैत्य मधु का संहारक” – भगवान का प्रसिद्ध नाम मधुसूदन इसी से है। पुराणों के
अनुसार आदिकाल में विष्णु ने मधु-कैटभ नामक असुरों का वध किया था।
श्रीकृष्ण विष्णु के अवतार हैं, अतः अर्जुन उन्हें मधुसूदन नाम से संबोधित करते हैं।
इस नाम से यह भी संकेत मिलता है कि कृष्ण किसी मधु (मिष्ठान्न) के भी नाशक हैं –
अर्थात आसुरी मधुर वाचालता को नष्ट कर सत्य स्थापित करते हैं। |
| 56 |
मथुरानाथ |
मथुरानाथ का अर्थ है
“मथुरा के नाथ (ईश्वर/स्वामी)”। श्रीकृष्ण का जन्मस्थान मथुरा नगरी थी और कंस-वध
के बाद उन्होंने मथुरा को अत्याचार से मुक्त कर वहां शांति स्थापित की। विष्णु
पुराण में कृष्ण को मधुपति तथा मथुराधिपति कहा गया है – उन्होंने मथुरा के
राजा उग्रसेन (अपने नाना) को राजगद्दी लौटाकर स्वयं सर्वेसर्वा के रूप में राज्य का
संचालन किया। इसलिए उन्हें मथुरानाथ कहा जाता है। |
| 57 |
द्वारकानायक |
द्वारकानायक का अर्थ है
“द्वारका नगरी के नायक (नायक/स्वामी)”। श्रीकृष्ण मथुरा से समुद्रतट पर
द्वारका बस्ती बसाकर यदुवंश समेत वहां रहने लगे। उन्होंने द्वारका (द्वारावती)
को अपनी राजधानी बनाया। महाभारत तथा भागवत में उनका द्वारका-प्रवास वर्णित है –
द्वारका के श्रेष्ठ पुरुष होने से वे द्वारकाधीश कहलाए। भक्त प्रह्लाद श्रीहरि को संबोधित
करते हुए कहते हैं: “हे द्वारकानायक (द्वारका के स्वामी), कृपा करके मेरे हृदय में
विराजें”। |
| 58 |
बली (बलिन) |
बलिन का अर्थ है
“परम बलशाली”। श्रीकृष्ण अपार शक्ति के धनी थे – बचपन में ही उन्होंने
भयंकर राक्षसों को खेल-खेल में मार गिराया। युवा होने पर एक अंगुली
पर पर्वत धारण किया और महाभारत के युद्ध में उनकी रणनीति से पांडव विजयी हुए।
उनको परमबलवान् के रूप में महाभारत और हरिवंश पुराण में चित्रित किया
गया है। इसी कारण भगवान को बलин (अत्यंत बलशाली)
एवं जगद्वीर कहा जाता है। |
| 59 |
वृन्दावनान्त-संचारी |
वृन्दावनान्त-संचारी का
अर्थ है “वृंदावन की सीमाओं/बाहरी वनभूमि में विहार करने वाले”। श्रीकृष्ण ने
अपने बाल-किशोर काल के सुखद वर्ष वृंदावन (ब्रजभूमि) में बिताए। वे अपने
सखाओं और गाय-बछड़ों के साथ वन-उपवनों में दूर तक घूमते थे। भागवत के
दसवें स्कंध में अनेक स्थलों पर उल्लेख है कि कृष्ण गोचर करते हुए यमुना तट,
गिरि-गोवर्धन और वृन्दावन के सघन वनों में भ्रमण करते थे। इसीलिए वे वृन्दावनान्त-शचारी
(वृंदावन के वन-उपवनों में क्रीड़ा करने वाले) कहे गए। |
| 60 |
तुलसीदाम-भूषण |
तुलसीदाम-भूषण का अर्थ
है “तुलसी की माला को भूषण (आभूषण) के रूप में धारण करने वाले”। भगवान विष्णु
को तुलसीदल अति प्रिय है – पुराणों में वृत्तांत आता है कि श्रीकृष्ण अपने गले में तुलसी
की माला धारण रखते थेnriol.com। तुलसी की पावन महक उनके अंगों में बसी रहती थी।
इसीलिए भक्ति-भजन में उन्हें तुलसीवृंदावनविहारी भी कहा जाता है। तुलसी-स्तुति में कहा गया है:
“तुलसी भगवान के गले का हार है” – अतः कृष्ण तुलसीदाम-भूषण हैं। |
| 61 |
स्यamantक-मणि-हर |
स्यमन्तक-मणेर्हर्त्रे अर्थ
“स्यamantक मणि को हरने (प्राप्त करने) वाले”। द्वारका की एक प्रसिद्ध घटना में
यह नाम मिलता है। भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 56) के
अनुसार सूर्यदेव की दी हुई स्यamantक मणि वृष्णि कुल के सत्यजीत
के पास थी। भ्रांतियोंवश कृष्ण पर मणि चोरी का संदेह आया, तो
सत्यजीत ने अपनी कन्या जाम्बवंती की सगाई उनसे करने का वादा किया।
कृष्ण ने जाम्बवान् को परास्त कर यह दिव्य रत्न प्राप्त किया और वापस लौटा
दिया। इस प्रकार बदनामी मिटाकर मणि हर लाने
के कारण श्रीकृष्ण स्यamantक-मणि-हर (हर्ता) कहलाए। |
| 62 |
नर-नारायणात्मक |
नर-नारायणात्मक का
अर्थ है “नर-नारायण स्वरूप वाले”। महाभारत के अनुसार भगवान विष्णु ने द्वापर में दो रूप
धारण किए – एक स्वयं श्रीकृष्ण और दूसरे अर्जुन। नारदपुराण में कहा गया है कि अर्जुन
पिछले जन्म में ऋषि नर थे और कृष्ण नारायण – दोनों अवतार साथी स्वरूप में
आए। इसलिए कृष्ण को नर-नारायणात्मक कहा जाता है। यह
भी संकेत है कि श्रीकृष्ण साक्षात नारायण हैं और अर्जुन उनके अंश
रूप नर हैं, दोनों मिलकर धर्म की स्थापना करते हैं। |
| 63 |
कुब्जा-कृष्णाम्बरधर |
कुब्जा-कृष्णाम्बर-धर
का अर्थ है “कुब्जा द्वारा दिए गए श्यामवर्ण चंदन-अलंकरण को धारण करने वाले”।
भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 42) में मथुरा की सेवा-भावना से युक्त त्रिवक्रा
(कुब्जा) का प्रसंग आता है। कुब्जा ने कृष्ण-बलराम के मथुरा आगमन पर उन्हें
चंदन का लेप भेंट किया। श्रीकृष्ण ने प्रसन्न हो कर अपने चरणों की रज से
कुब्जा को सुंदरी बना दिया और उसका चंदन-अंगराग स्वीकार किया
। इसलिए भगवान को कुब्जा-कृष्णाम्बरधर (कुब्जा द्वारा अर्पित श्याम चंदन को
धारणा करने वाले) कहा जाता है। |
| 64 |
मायिनी |
मायिनी (मायी)
का अर्थ है “माया के स्वामी”। श्रीकृष्ण को स्वयं योगमाया कहते हैं – वे अपनी
मायाशक्ति से ही इस जगत का संचालन करते हैं। गीता (७.१४) में श्रीकृष्ण कहते हैं:
“दैवी हि एषा गुणमयी मम माया... केवल भगवद्भक्ति से पार हो सकती है।”
अर्थात यह प्रकृति मेरी योगमाया हैrudraksha-ratna.com। भगवान स्वयं
मायाधीश हैं, उन पर माया का प्रभाव नहीं चलता। अतः उन्हें मायापति या
मायिनी कहा गया है। |
| 65 |
परमपुरुष |
परमपुरुष का अर्थ है
“सर्वोच्च पुरुषोत्तम” – यह भी विष्णु का ही नाम है। श्रीकृष्ण स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम
भगवान हैं। श्रीमद्भगवद्गीता (१५.१८) में श्रीकृष्ण कहते हैं: “चूँकि मैं क्षर
(नश्वर) और अक्षर (शाश्वत आत्मा) से परे हूँ, इसलिए वेदों में मुझे पुरुषोत्तम कहते हैं।”
वैष्णव परम्परा में कृष्ण को परम ब्रह्म, परमात्मा, भगवान – इन तीनों स्वरूपों से परे
परम पुरुष माना गया है। |
| 66 |
मुष्टिक-चाणूर-मल्लयुद्ध-विशारद |
मुष्टिकासुर-चाणूर-मल्लयुद्ध-विशारद
का अर्थ है “मुष्टिक और चाणूर पहलवानों से कुश्ती में निपुणता से लड़ने वाले”।
भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 44) में मथुरा के रंगभूमि प्रसंग में श्रीकृष्ण-बलराम
का मल्लयुद्ध वर्णित है। कंस ने अक्रूर उत्सव में अपने दो बलवान पहलवान
– मुष्टिक और चाणूर – को बालकों से लड़ाया। श्रीकृष्ण ने चाणूर को मार गिराया
और बलराम ने मुष्टिक को। आसुरी शक्तियों पर उनकी इस अद्भुत विजय
के कारण भगवान मुष्टिक-चाणूर-मल्लयुद्ध-विशारद (कुशल पहलवान-संग्रामकर्ता) कहे गए। |
| 67 |
संसार-वैरी |
संसार-वैरी का अर्थ
है “भव-सागर (जन्म-मृत्यु रूपी संसार) के शत्रु”। श्रीकृष्ण संसार-बंधन से मुक्ति दिलाने
वाले भगवान हैं – वे जन्म-मरण के चक्र को मिटाकर भक्तों को मोक्ष प्रदान करते हैं।
गीता (४.३६) में वे कहते हैं, “संपूर्ण पापों से मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा”। जीवों
को अज्ञान रूपी संसार से तारने के कारण उन्हें संसार-वैरि कहा जाता है
। उनके नाम-स्मरण से ही जन्म-मृत्यु का चक्र कट जाता है (कीर्तन में “भव-बन्ध-बिमोचन”
कहा गया है)। |
| 68 |
कंसारि |
कंसारि का अर्थ है
“कंस का शत्रु”। मथुरा का अत्याचारी राजा कंस श्रीकृष्ण का मामा था, जिसे प्रभु ने
अंततः मार गिराया। भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 44) में कंस-वध का वर्णन है –
रंगशाला में मल्लयुद्ध के बाद श्रीकृष्ण उछलकर राजसिंहासन पर पहुँचे, कंस को बालों
से पकड़कर घसीटा और धरती पर गिराकर उसका वध कर दिया। अपने
माता-पिता और जनता को कंस के आतंक से मुक्त कराने के कारण श्रीकृष्ण
कंसारि (कंस के शत्रु/विजेता) के नाम से प्रसिद्ध हुए। |
| 69 |
मुरारि |
मुरारि का अर्थ है
“मुर दैत्य का शत्रु”। मुर नामक एक शक्तिशाली असुर नरकासुर का सहायक था।
भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 59) के अनुसार जब श्रीकृष्ण नरकासुर का वध
करने उसकी नगरी प्रधान नगर पहुंचे, तब पाँच-सिर वाले उग्र असुर मुर ने उनका मार्ग रोका।
कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से मुरासुर का शीर्षोच्छेद कर उसे वहीं समाप्त किया
। इसपर देवलोक ने उनकी स्तुति “मुरारेः” कहकर की। तभी से भगवान मुरारि
(मुर दानव के दुश्मन) कहलाए। |
| 70 |
नरकान्तक |
नरकान्तक का अर्थ है
“नरकासुर (भौमासुर) का अंत करने वाले”। प्राग्ज्योतिषपुर के असुरराज नरकासुर ने
१६ सहस्र कन्याओं को बंदी बना रखा था। भागवत पुराण में कथा है कि श्रीकृष्ण
ने पत्नी सत्यभामा के संग असुर के दुर्ग पर आक्रमण करके नरकासुर का वध किया
और सभी कन्याओं को मुक्त कराया। इस विजय पर देवी पृथ्वी (नरकासुर की माता)
ने भगवान को सुदर्शन चक्र व राजमुकुट भेंटकर उनका अभिनंदन किया। नरकासुर का
अंत करने के कारण श्रीकृष्ण नरकान्तक कहलाए। |
| 71 |
अनादि ब्रह्मचारी |
अनादि ब्रह्मचारी
का अर्थ है “जिसका न आदि है, न अंत – तथा जो शाश्वत ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं”।
यद्यपि श्रीकृष्ण ने गृहस्थ जीवन अपनाया, फिर भी उनकी आत्मस्थिति ब्रह्मचारी की ही थी –
वे अप्रेपंच हैं। शास्त्रों में कहा गया कि परमात्मा अजन्मा है (अनादि), केवल लीलार्थ अवतार
लेते हैं। और यद्यपि वे लीला में अनेक पत्नियों के पति बने, परन्तु उनकी चेतना
सदा आत्मयोग में स्थिर रही। वे गुणातीत हैं, अतः उन्हें अनादि ब्रह्मचारी कहते
हैं। |
| 72 |
कृष्णाव्यसन-तर्षक
(कृष्ण-व्यासन-हर्षक) |
कृष्णा-व्यासन-कर्त्ता का
अर्थ है “द्रौपदी (कृष्णा) के क्लेश का हरण करने वाले”। महाभारत में पांडवपत्नी
द्रौपदी को कृष्णा नाम से भी संबोधित किया गया है। सभा-पर्व में जब दुर्योधन
के आदेश पर दुःशासन ने द्रौपदी का चीर हरण करना चाहा, तब भीलुपति
श्रीकृष्ण ने उनकी लाज बचाई – द्रौपदी ने गोविंद को पुकारा और कृष्ण ने
अक्षय वस्त्र प्रदान कर उनका मान रखा। इस घटना से
भगवान कृष्णाव्यसन-हारक (द्रौपदी के संकट हर्ता) कहे गए। |
| 73 |
शिशुपाल-शिरश्छेदक |
शिशुपाल-शिरश्छेदक (
शिशुपाल-शिरश्छेत्रे) का अर्थ है “शिशुपाल का सिर काटने वाले (संहार करने वाले)”।
महाभारत तथा भागवत दोनों में यह प्रसंग मिलता है – इन्द्रप्रस्थ में राजसूय यज्ञ
के समय चेदिराज शिशुपाल ने भगवान कृष्ण को भरी सभा में 100 से अधिक गालियाँ दीं।
पहले श्रीकृष्ण मौन रहे, पर 101वीं अत्यधिक निन्दा पर उन्होंने चक्र छोड़ा और शिशुपाल
का सिर वहीं काट डाला। शिशुपाल का आत्मा कृष्ण में विलीन हो
गया (उसे मोक्ष मिला)। तब से श्रीकृष्ण शिशुपाल-वधकर्ता या
शिशुपाल-शिरश्छेदक कहलाए। |
| 74 |
दुर्योधन-कुलान्तक |
दुर्योधन-कुलान्तक का
अर्थ है “दुर्योधन के कुल (कौरव वंश) का अंत करने वाले”। महाभारत युद्ध में
श्रीकृष्ण की नीति और सहायता से धर्म पक्ष पांडवों की विजय हुई और दुर्योधन
सहित समूचे कौरव वंश का नाश हो गया। युद्ध के १८वें दिन भीमसेन और
दुर्योधन गदा युद्ध कर रहे थे। महाभारत के अनुसार भीम दुर्योधन की जाँघ
तोड़ने में संकोच कर रहे थे, तब श्रीकृष्ण ने संकेत देकर उन्हें अधो-प्रहार
करने के लिए प्रेरित किया। भीम ने कृष्ण की आज्ञानुसार नियम तोड़कर
दुर्योधन की जंघा पर गदा मारी जिससे वह मृतप्राय हो गया। इस प्रकार श्रीकृष्ण
ने अधर्म के कुल का अंत करवाया और दुर्योधन-कुलान्तक नाम से सम्मानित हुए। |
| 75 |
विदुराक्रूर-वरद |
विदुर-अक्रूर-वरद का अर्थ है
“विदुर और अक्रूर को वर प्रदान करने वाले”। यह नाम भगवान द्वारा अपने भक्तों को
दिए गए स्नेह और आशीर्वाद को दर्शाता है। महाभारत में आता है कि कृष्ण हस्तिनापुर
सभा में दुर्योधन का आतिथ्य अस्वीकार कर अपने भक्त विदुर के घर पधारे और
सादा भोजन कर उनका मान बढ़ाया। इसी प्रकार भागवत पुराण (स्कंध 10)
में कथा है कि मथुरा जाते समय कृष्ण ने अक्रूर को यमुना नदी में अपने
विष्णु रूप का दिव्य दर्शन देकर कृतार्थ किया। भक्तवत्सल प्रभु की इन
कृपाओं के कारण उन्हें विदुराक्रूर-वरद कहा जाता है – अर्थात् जिन्होंने
विदुर और अक्रूर को वरदान/अनुग्रह दिया। |
| 76 |
विश्व रूप-प्रदर्शक |
विश्व-रूप-प्रदर्शक का
अर्थ है “जो अपना विश्वरूप प्रदर्शित करते हैं”। महाभारत के भीष्मपर्व में श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन
को दिया गया विराट रूप का दर्शन प्रसिद्ध है। भगवद्गीता अध्याय 11 में कृष्ण ने अपना
विश्वव्यापी रूप दिखाया – जिसमें सहस्रों मुख, आंखें, अद्भुत तेज और संपूर्ण
ब्रह्माण्ड उनके शरीर में समाहित दिखाई दिया। अर्जुन ने भय-मिश्रित भक्ति
के साथ उस विश्वरूप को देखा। विश्वरूप के दर्शन कराने वाले होने से भगवान
विश्व-रूप-प्रदर्शक कहलाते हैं। |
| 77 |
सत्यवाक् |
सत्यवाक् का अर्थ
है “सदैव सत्य बोलने वाले”। श्रीकृष्ण को सत्यवादिता के लिए भी जाना जाता है –
उन्होंने जीवन भर धर्म और सत्य का पालन किया। महाभारत में युधिष्ठिर कहते हैं कि
कृष्ण की जिह्वा पर कभी असत्य नहीं आया। गीता में स्वयं श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं,
“देवताओं और महर्षियों को भी मैं मिथ्या प्रतीत हो सकता हूँ, किंतु मैं कभी किसी से
मिथ्या नहीं होता” (गीता 7.25 का भाव)। अतः सत्य पर अडिग रहने के कारण
उनका नाम सत्यवाक् (सत्यभाषी) है। |
| 78 |
सत्यसंकल्प |
सत्यसंकल्प का अर्थ है
“जिनका संकल्प सदा सत्य होता है (अटल रहता है)”। यह ईश्वर का
एक वैशिष्ट्य नाम है – स्कन्द पुराण में कहा गया है कि भगवान
का जो संकल्प (इच्छा) होता है, वह अवश्य पूरा होता है,
उसे कोई विफल नहीं कर सकता। श्रीकृष्ण सत्यसंकल्प हैं क्योंकि
उन्होंने जो-जो लीला या कार्य ठाना, वह सत्य सिद्ध हुआ। उदाहरणार्थ,
उन्होंने कंस-वध, धर्म की विजय आदि संकल्प लिए और सभी पूरे हुए।
इस प्रकार उनकी इच्छा अपरिहार्य है। |
| 79 |
सत्यभामापति (सत्यभामारत) |
सत्यभामा-रत
(सत्यभामापति) का अर्थ है “अपनी पत्नी सत्यभामा के प्रियतम”।
सत्यभामा द्वारका में श्रीकृष्ण की आठ मुख्य पत्नियों में से थीं। पुराणों
में वर्णित है कि सत्यभामा को श्रीकृष्ण अत्यंत चाहते थे। स्वर्ग से पारिजात वृक्ष
लाकर उन्होंने सत्यभामा की इच्छा पूर्ण की, साथ ही उन्हें कौस्तुभ मणि
भी उपहार में दी। भगवान की इसी प्रिया के संदर्भ में उनका नाम सत्यभामारत
(सत्यभामा के रंजनकर्ता) या भामाकांत प्रसिद्ध हुआ। |
| 80 |
जयिन् |
जयिन् (जयी) का
अर्थ है “सदैव विजयी”। श्रीकृष्ण साक्षात विजयरूप हैं – उन्हें किसी युद्ध
या कार्य में कभी पराजय का मुख नहीं देखना पड़ा। महाभारत में स्वयं
भगवान कहते हैं, “पाण्डव जहां धर्म के लिए संघर्ष करेंगे, वहाँ विजय
निश्चित होगी क्योंकि मैं उनके साथ हूँ” (गीता 18.78 का भाव)।
अर्जुन ने भी कृष्ण को जगन्नियन्ता विजयी पुरुषोत्तम कहा है। इसीलिए
भगवान का नाम जयिन् (शाश्वत विजेता) है। |
| 81 |
सुभद्रा-पूर्वज |
सुभद्रा-पूर्वज का अर्थ है
“सुभद्रा के अग्रज (बड़े भाई)”। भागवत पुराण के अनुसार सुभद्रा श्रीकृष्ण
की बहन थीं (जो बाद में अर्जुन की पत्नी बनीं)। श्रीकृष्ण व बलराम ने
सुभद्रा का स्वयंवर अर्जुन से कराया था। महाभारत में श्रीकृष्ण को
सुभद्रा का भ्राता कहा गया है। सुभद्रा-पूर्वज नाम से भगवान का पारिवारिक स्नेह झलकता
है – उन्होंने अपने भगिनी सुभद्रा की रक्षा तथा विवाह में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। इसलिए
वे भ्रातृरत्न सुभद्रा-पूर्वज कहलाते हैं। |
| 82 |
विष्णु |
विष्णु स्वयं
श्रीकृष्ण का ही सार्वभौमिक नाम है, जिसका अर्थ है “व्यापक सर्वव्यापी सत्ता”।
भागवत, महाभारत सहित अनेक ग्रंथों में स्पष्ट कहा गया है कि वृन्दावन के कृष्ण
कोई और नहीं, स्वयं भगवान विष्णु हैं। अर्जुन ने गीता उपदेश सुनने के बाद
कृष्ण की महिमा जानते हुए उन्हें साक्षात नारायण कहकर प्रणाम किया –
“त्वमादिदेवः पुरुषः पुराणः” (गीता 11.38)। वैष्णव परम्परा
में कृष्ण को सर्वश्रेष्ठ विष्णु-तत्व माना जाता है, इसलिए उनका एक नाम
विष्णु भी है। |
| 83 |
भीष्म-मुक्ति-प्रदायक |
भीष्म-मुक्ति-प्रदायक
का अर्थ है “भीष्म को मुक्ति प्रदान करने वाले”। महाभारत युद्ध के बाद पितामह
भीष्म बाणों की शय्या पर उत्तरायण की प्रतीक्षा कर रहे थे। तब
श्रीकृष्ण उनके पास धर्मराज युधिष्ठिर को लेकर गए। भीष्म ने कृष्ण की
स्तुति कर उन्हें जगद्गुरु कहा और परमज्ञान दिया। अपनी बातें समाप्त कर
उन्होंने कृष्ण की अनुमति और स्मरण करते हुए प्राण त्यागे, तब श्रीकृष्ण ने
उन्हें परम गति दी। इस प्रकार भक्त भीष्म को मोक्ष देने के कारण
भगवान भीष्म-मुक्ति-प्रदायक कहे जाते हैं। |
| 84 |
जगद्गुरु |
जगद्गुरु का अर्थ है
“संपूर्ण जगत के गुरु (आचार्य)”। श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश देकर मानवता को धर्म,
योग और भक्ति का मार्ग दिखाया। भगवद्गीता को विश्व का मार्गदर्शक ग्रन्थ माना जाता है
– स्वयं भगवान ने अर्जुन को निमित्त बनाकर समस्त लोकों का कल्याण करने वाले सिद्धांत
बताए। इसलिए उन्हें योगाचार्य और जगद्गुरु (समस्त संसार के गुरु) माना जाता है।
वे वेदों के भी प्रवर्तक हैं; भागवत में कहा गया “कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम्” –
कृष्ण समस्त जगत के गुरु हैं। |
| 85 |
जगन्नाथ |
जगन्नाथ का अर्थ है
“जगत के नाथ (स्वामी)”। यह भगवान का सार्वभौमिक नाम है, विशेषकर श्रीकृष्ण के स्वरूप
को इंगित करता है। उड़ीसा के पुरी धाम में श्रीकृष्ण जगन्नाथ रूप में अपने भाई
बलराम और बहन सुभद्रा के साथ विराजते हैं। वहाँ के स्कन्द
पुराण आदि ग्रंथों में उनकी महिमा गाई गई है। जगन्नाथ शब्द इस
सत्य को दर्शाता है कि संपूर्ण सृष्टि के स्वामी श्रीहरि ही हैं। श्रीकृष्ण अपने
पूर्ण विष्णुरूप में जगन्नाथ अर्थात विश्व के अधिपति हैं – भक्त
इन्हें इसी नाम से कीर्तन करते हैं। |
| 86 |
वेणु-नाद-विशारद |
वेणु-नाद-विशारद का
अर्थ है “वेणु (बाँसुरी) के सुरों में पारंगत”। मुरलीधर श्रीकृष्ण की बाँसुरी का मधुर नाद
सभी को मोहित कर देता था। भागवत पुराण में ब्रज गोपियाँ कहती हैं कि जब कृष्ण वन
में बाँसुरी बजाते हैं, तब गायें तक उस मधुर तान पर मुग्ध होकर स्थिर खड़ी हो जाती हैं,
ग्वालबाल और समस्त प्राणी उस संगीत में खो जाते हैं। वृंदावन की घाटियों में उनकी वेणु-ध्वनि
गूंजती थी। इस दिव्य वंशीवादन-कला में निपुण होने से भगवान वेणुनाद-विशारद कहलाते हैं। |
| 87 |
वृषभासुर-विध्वंसि |
वृषभासुर-विध्वंसि का अर्थ है
“वृषभासुर (अरिष्टासुर) नामक राक्षस का विध्वंस करने वाले”। भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 36)
में वृंदावन के एक और असुर अरिष्ट की कथा है। अरिष्टासुर एक विशाल क्रोधित सांड (बैल)
का रूप लेकर गया और गोकुल में आतंक मचाया। श्रीकृष्ण ने आगे बढ़कर उस अति बलवान
वृषभ को उसके सींग पकड़ कर उठा पटका और उसे मार डाला। चूँकि
अरिष्ट एक वृषभासुर था, उसके वध के कारण श्रीकृष्ण को वृषभासुर-विध्वंसक या वृषभान्तक
कहा गया है। |
| 88 |
बाणासुर-काण्ड-छेदन
(बाणासुर-कान्तकृत) |
बाणासुर-कारान्तकृत
का अर्थ है “बाणासुर के भुजाओं का अंत करने वाले (छेदन करने वाले)”। यह लीला
भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 63) में वर्णित है – भगवान शिव के भक्त बाणासुर
के सहस्त्र भुजाएँ थीं। जब श्रीकृष्ण ने बाणासुर की सेना पर आक्रमण किया तो शिवजी
भी युद्ध में बाणासुर की ओर से आए। घोर संग्राम में भगवान कृष्ण ने अपना सुदर्शन
चक्र चलाया और बाणासुर की हज़ारों भुजाएँ काट डालीं। अंत
में शिव के अनुरोध पर कृष्ण ने बाणासुर को जीवनदान दिया लेकिन उसकी ताकत
क्षीण कर दी। इस पराक्रम के कारण वे बाणासुर-कान्तक (जिसने बाणासुर के
अभिमानरूपी भुजाओं का अंत किया) कहलाए। |
| 89 |
युधिष्ठिर-प्रतिष्ठापक |
युधिष्ठिर-प्रतिष्ठात्रे का अर्थ है
“युधिष्ठिर को राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित करने वाले”। महाभारत युद्धोपरांत श्रीकृष्ण ने
पांडवों को धार्मिक राजकाज स्थापित करने में प्रमुख भूमिका निभाई। अधर्मीय कौरवों
के विनाश के बाद धर्मराज युधिष्ठिर को राजगद्दी देना आवश्यक था। युद्ध की समाप्ति
पर भी युधिष्ठिर संहार से व्यथित थे, तब कृष्ण ने भीष्म से उनका मोह दूर कराया। अन्तत:
श्रीकृष्ण की उपस्थिति में युधिष्ठिर हस्तिनापुर के सम्राट बने। इस हेतु भगवान
को युधिष्ठिर-प्रतिष्ठापक कहा जाता है – जिन्होंने धर्मराज को राज्य पर प्रतिष्ठित
कर धर्म राज्य स्थापित किया। |
| 90 |
बर्हिबार्हवतंसक |
बर्हि-बर्हावतंसक का अर्थ
है “बर्हि (मयूर-पंख) को मुकुट में अलंकार की तरह धारण करने वाले”। श्रीकृष्ण
के मुकुट पर मोरपंख सुशोभित रहता है – यह उनकी एक
विशिष्ट पहचान है। भागवत (10.21.5) में गोपियाँ कहती हैं: “कृष्ण
अपने मुकुट पर मनोहर मोर-पिच्छ लगाए हुए वन-वन विचरते हैं, उनके
रूप पर उस मयूरपंख की छटा और बढ़ जाती है।” अतः भगवान बंके
बिहारी (त्रिभंगी मूर्ति) अपने सिर पर बर्हि-पिच्छ धारण करने के कारण
बर्हिबर्हावतंसक नाम से प्रशंसित हैं। |
| 91 |
पार्थसारथि |
पार्थसारथि का अर्थ है
“पार्थ (अर्जुन) के रथ के सारथी (चालक)”। यह नाम महाभारत में श्रीकृष्ण की
महान भूमिका को दर्शाता है। युद्ध से पूर्व श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपना बिना-हथियार
वाले सहायक होने का वचन दिया था। अर्जुन ने उन्हें अपना सारथी बनने को कहा
और उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया। कुरुक्षेत्र के रण में श्रीकृष्ण अर्जुन
का रथ हांकते हुए प्रत्येक मोड़ पर उन्हें मार्गदर्शन देते रहे। उनके कुशल
सारथ्य और नीति से अर्जुन अजेय रहे। यह विलक्षण सेवा-भावना देखकर
देवताओं ने उन्हें पार्थसारथि (अर्जुन के सारथी) नाम से वंदित किया। |
| 92 |
अव्यक्त |
अव्यक्त का अर्थ है
“जो प्रत्यक्ष इंद्रियबोध से परे है, अप्रकट”। गीता (७.२५) में श्रीकृष्ण कहते हैं: “न
हं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः” – मेरी योगमाया से ढकी प्रकृति के कारण
सामान्य लोगों को मैं प्रकट नहीं होता हूँ। भगवान का दिव्य स्वरूप स्थूल इंद्रियों
से अव्यक्त रहता है, केवल शुद्ध हृदय से ही उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है।
इस गुण के कारण वे अव्यक्त कहलाते हैं – जो सदा रहस्यमय और अलक्षित हैं। |
| 93 |
गीतामृत-महोदधि |
गीतामृत-महोदधि का अर्थ
है “भगवद्गीता रूपी अमृत के महान सागर”। भगवान श्रीकृष्ण द्वारा प्रदत्त श्रीमद्भगवद्गीता
को अमृत समान पवित्र ज्ञान कहा जाता है। स्वयं श्रीकृष्ण ज्ञान के अनन्त सागर हैं –
गीता उनके मुख से निकला अमृत है। भक्तिमाल में श्रीकृष्ण को गीतमृत सिन्धु कहा
गया है। विष्णु सहस्रनाम में भी एक नाम “गीतामृत-महानिधि” मिलता है। इस प्रकार,
गीता रूपी अमृत के सागर होने से भगवान को गीतामृत-महोदधि कहा जाता है। |
| 94 |
कालिय-फणि-मणि-शोभित-पादपद्म |
कालिय-फणि-माणिक्य-रञ्जित-श्री-पादाम्बुज
का अर्थ है “जिनके कमल चरण कालिय नाग के फणों के मणियों से अलंकृत हो उठे”।
भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 16) में वृंदावन के कालिय नाग का प्रसंग मिलता है –
यमुना नदी में स्थित विशाल विषधर कालिय के विष से जल दूषित था। श्रीकृष्ण ने यमुना
में कूदकर उस नाग के फनों पर नृत्य किया और उसे परास्त कर नदी शुद्ध कर दी। नागराज
कालिय के मस्तकों पर बहुमूल्य मणियाँ थीं, जिन पर नृत्य करते हुए श्रीकृष्ण के चरण
चमक उठे। इस लीला के स्मरण में उनका नाम कालिय-फणि-मणि-रंजित-पादाम्बुज पड़ा। |
| 95 |
दामोदर |
दामोदर का शाब्दिक
अर्थ है “दाम (रस्सी) से बँधे उदर (कमर) वाले”। यह श्रीकृष्ण की बाल-लीला से
संबंधित अत्यंत प्रसिद्ध नाम है। भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 9) के अनुसार
माखन चोरी करते पकड़े जाने पर माता यशोदा ने नटखट बालकृष्ण को ऊखल
(जग) से कमर में रस्सी बाँधकर दंडित करना चाहा। आश्चर्य कि पहली बार
रस्सी छोटी पड़ी, पुनः जोड़ने पर भी दो अंगुल छोटी – अंततः प्रभु की
कृपा से बँध तो गई लेकिन दो वृक्ष उखाड़ दिए। कमर पर रस्सी बाँधे होने के
कारण गोपियाँ प्रेम से कृष्ण को दामोदर नाम से पुकारने लगीं। कार्तिक माह में
श्रीदामोदराष्टक इस लीला की स्तुति करता है। |
| 96 |
यज्ञभोक्त () |
यज्ञभोक्त का अर्थ है
“यज्ञ का भोग करने वाले (अर्थात अर्घ्य/हविष्य को स्वीकार करने वाले देव)”। श्रीकृष्ण
स्वयं विष्णु हैं जिन्हें सभी वैदिक यज्ञों का प्रधान भोक्ता कहा गया है – “भोक्तारं यज्ञतपसाम्”
(गीता 5.29)। राजसूय यज्ञ में स्वयं युधिष्ठिर ने कृष्ण
को अग्रपूजा समर्पित की थी क्योंकि वे ही समस्त यज्ञों के अधिकारी हैं।
भगवत्पुराण में प्रत्येक यज्ञ की आहुति अंततः नारायण को प्राप्त होती बताई गई है।
अतः भगवान को यज्ञभोक्ता नाम से अभिहित किया जाता है – वे ही
यज्ञान्न के वास्तविक उपभोक्ता हैं। |
| 97 |
दानवेन्द्र-विनाशक |
दानवेंद्र-विनाशक का
अर्थ है “दानवों (असुरों) के स्वामियों/राजाओं का विनाश करने वाले”। श्रीकृष्ण ने
अपने अवतार में एक के बाद एक अनेक दुष्ट अत्याचारियों का संहार किया, जो
दानव-स्वभाव के थे। पूतना, कंस, कालिय, प्रलम्ब, नरकासुर, शिशुपाल आदि
कई राक्षस-पति एवं अधर्मी राजाओं को उन्होंने समाप्त कर धर्म की स्थापना
की। इसी कारण शास्त्रों में उन्हें असुर-दलनकर्ता कहा गया है।
विशेषकर दानवेंद्र-विनाशक नाम उनकी उस लीला का स्मरण कराता है
जहाँ उन्होंने असुरों के शीर्ष नेताओं का अंत किया। |
| 98 |
नारायण |
नारायण का शाब्दिक
अर्थ है “नार (जीवात्माएं या जल) में रहने वाले” – यह विष्णु का परमतम नाम है।
स्वयं श्रीकृष्ण को भागवत तथा गीता में भगवान नारायण कहा गया है।
महाभारत में शांति-पर्व में ऋषि नारायण-कथा आती है जहाँ ज्ञात होता है कि देवकी-नंदन
कृष्ण साक्षात नारायण हैं जो प्रत्येक युग में धर्म की रक्षा को अवतार लेते हैं।
भागवत में भी ब्रह्माजी प्रार्थना करते हैं: “नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिनाम्” – कृष्ण
तुम नारायण हो। अतः कृष्ण का नाम नारायण स्वयं उनके विष्णुत्व का परिचायक है। |
| 99 |
परब्रह्म |
परब्रह्म का अर्थ है
“परम ब्रह्म (सर्वोच्च चेतना)”। गीता में अर्जुन ने भगवान कृष्ण को
साक्षात परब्रह्म कहा – “परं ब्रह्म परम धाम पवित्रं परमं भवान्”। अर्थात “आप
परम ब्रह्म हैं, परम धाम हैं, परम पवित्र हस्ती हैं”
। उपनिषदों में निरूपित निष्क्रिय-ब्रह्म वस्तुतः श्रीकृष्ण का ही एक प्रकाश है।
भक्त प्रल्हाद कहते हैं: “मैं उस परमब्रह्म को नमन करता हूँ जो नरसिंह-कृष्ण
रूप में प्रकट हुआ”। इस तरह श्रीकृष्ण को परब्रह्म कहना वैदिक सिद्धांतों के अनुरूप है। |
| 100 |
पन्नगाशन-वाहन |
पन्नगा-शन-वाहन का अर्थ है
“जिसका वाहन (वाहन) सर्प-भक्षी है”। यहाँ संकेत भगवान के गरुड़ वाहन की ओर है –
गरुड़ साँप (पन्नग) का भक्षण करते हैं। श्रीकृष्ण के वाहन गरुड़ देव हैं,
जो नागों के शत्रु माने जाते हैं। गरुड़ पर आरूढ़ विष्णु को गरुड़ध्वज कहा जाता है।
कालिय-दमन लीला में भी गरुड़ का उल्लेख आता है – कालिया पहले गरुड़-भय
से ही यमुना में छिपा था। गरुड़ (खगेश) विष्णु के सदा साथ रहते हैं,
इसलिए श्रीकृष्ण का एक नाम पन्नगाशन-वाहन भी है – अर्थात जिसका
वाहन सर्पभक्षी गरुड़ है। |
| 101 |
जल-क्रीड़ासक्त-गोपीवस्त्र-अपहर्ता |
जल-क्रीड़ा-समासक्त-गोपी-वस्त्रापहारक
अर्थ “जो जल-क्रीड़ा में मग्न गोपियों के वस्त्र चुरा लेते हैं”। यह श्रीकृष्ण की
वृंदावन काल की एक मधुर लीला से संबंधित नाम है। भागवत पुराण (स्कंध 10 अध्याय 22)
के अनुसार शरद पूर्णिमा पर वृंदावन की कुछ गोपियाँ यमुना में स्नान कर रही थीं और कृष्ण
ने चोरी-छिपे उनके वस्त्र उठा लिए और वृक्ष पर चढ़ गए। गोपियों के विनती करने पर
उन्होंने उन्हें सदाचर का उपदेश देकर वस्त्र लौटाए। इस चुटीली लीला के कारण कृष्ण
गोपी-वस्त्र-हरता कहलाए – जिसे लोक भाषाओं में चीरहरण लीला कहा जाता है। |
| 102 |
पुण्यश्लोक |
पुण्यश्लोक का अर्थ
है “जिनकी कीर्ति-पाठ से पुण्य मिलता है”। श्रीकृष्ण के नाम, रूप, गुण और
लीला का कीर्तन स्वयं में परम पुण्यदायक माना गया है। भागवत महापुराण को
पुण्यश्लोक कहा जाता है क्योंकि उसमें भगवान की लीलाओं का बखान है।
स्वयं भागवत (१२.१२.५१) में कहा है: “श्रीकृष्ण की कथाएँ पुण्यश्रवण कीर्तन हैं”
– उन्हें सुनने-गाने मात्र से पाप नष्ट होते हैं और पुण्य संचित होता है
। अतः भगवान को पुण्यश्लोक भी कहा जाता है – जिनकी महिमा का
उच्चारण पुण्य फल देता है। |
| 103 |
तीर्थकर |
तीर्थकर का
शाब्दिक अर्थ है “तीर्थों (पवित्र स्थलों) का निर्माण करने वाले”। इस नाम
का भावार्थ है कि श्रीकृष्ण जहाँ-जहाँ गए, वह स्थान पावन तीर्थ बन गया।
मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, कुरुक्षेत्र – जहाँ भगवान के चरण पड़े, वे
धाम तीर्थराज बन गए। भागवत पुराण में उद्धव जी कहते हैं: “भगवान
के चरणचिन्ह जिस धरती पर अंकित हो जाएँ, वहाँ कल्याण के सरोवर
उत्पन्न हो जाते हैं”। इसलिए श्रीकृष्ण को तीर्थकर
(तीर्थों के प्रवर्तक) कहा जाता है – उनके कारण ही तीर्थों की महिमा है। |
| 104 |
वेदवेद्य |
वेदवेद्य का
अर्थ है “जो वेदों द्वारा जाने जाने योग्य हैं” अथवा “वेदों के उद्देश्य जिनसे पूर्ण होते हैं”।
प्रत्येक वैदिक मंत्र अंततः नारायण की ही स्तुति करता है। गीता (१५.१५) में
श्रीकृष्ण कहते हैं: “वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यः” – अर्थात समस्त वेद
मुझ परमात्मा को ही प्रकट करते हैं। उनकी लीला, नाम, गुण –
सभी वेदों में स्तुत्य हैंrudraksha-ratna.com। इसीलिए उन्हें वेदवेद्य
(वेद द्वारा विख्यात) कहते हैं। भगवान वेदों के प्रणेता भी हैं,
इसलिए यह नाम उनकी महिमा को प्रकट करता है। |
| 105 |
दयानिधि |
दयानिधि का
अर्थ है “करुणा का निधि (भंडार)”। श्रीकृष्ण दयालुता की साक्षात मूर्ति हैं –
दीन-दुखियों पर दया करना उनका स्वभाव है। शास्त्रों में श्रीहरि को पतितपावन
कहा गया है, जो पतितों पर भी दया करके उन्हें अपना लेते हैं। नंद-यशोदा
जैसे साधारण गौपालक को अपने माता-पिता रूप में चुनना, विदुर के घर भोजन करना,
उद्धव जैसे योगी को भक्ति सिखाना – ऐसी कई लीलाएँ उनकी दया का प्रमाण हैं।
भागवत में उन्हें दयानिधि (दया के सागर) कहा गया है। |
| 106 |
सर्वभूतात्मक |
सर्व-भूत-आत्मक का अर्थ
है “समस्त भूत (तत्त्वों/प्राणियों) में आत्मरूप से विराजमान”। उपनिषद कहते हैं परमात्मा सब
प्राणियों के हृदय में आत्मा रूप से निवास करते हैं। श्रीकृष्ण ने गीता (१५.१५) में कहा –
“सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्ट:”, अर्थात मैं सबके हृदय में अंतर्यामी रूप से स्थित हूँ।
वे समस्त पंचमहाभूत तत्वों में भी व्याप्त हैं – पृथ्वी में गंध बनकर, अग्नि में तेज बनकर
(गीता 7.9)। इस विश्वव्यापी सत्ता के कारण उनका नाम सर्वभूतात्मक है। |
| 107 |
सर्वग्रह-रूपी |
सर्वग्रह-रूपी का अर्थ है
“सभी ग्रह-नक्षत्र जिनके रूप में हैं”। भागवत सहित ज्योतिष शास्त्र में कहा
गया है कि नवग्रहादि देवता भगवान विष्णु के अंश हैं। सूर्य, चन्द्र, मंगल
आदि ग्रह क्रमशः उनके नेत्र, मन, शक्तियाँ आदि माने गए हैं।
श्रीकृष्ण विश्व के आधार हैं – “विश्वं विष्णु:” (विष्णु सहस्रनाम) – वे स्वयं
समस्त ब्रह्मांड के रूप हैं। इस दृष्टि से वे सभी ग्रह, लोक और दिशाओं के
रूप में व्याप्त हैं। अतः ब्रह्माण्ड की प्रत्येक शक्ति जिसमें सम्मिलित हो,
ऐसे नारायण को सर्वग्रह-रूपी नाम दिया गया है। |
| 108 |
परात्पर |
परात्पर का अर्थ है
“जो परम से भी परे है (सर्वोच्च से भी उच्च)”। वेदों में परमेश्वर को परात्पर ब्रह्म कहा
गया है – अर्थात ईश्वर से बढ़कर कुछ भी नहीं। नारद पांचरात्र में विष्णु को
परात्पर कहा गया है। श्रीकृष्ण स्वयं उस परात्पर ब्रह्म के पूर्णतः व्यक्त स्वरूप
हैं। इसलिए भक्ति-ग्रंथों में उनकी महिमा “परात्परे” कहकर की गई
है। उदाहरणत:, गोपालतापिनी उपनिषद में कहा है:
“यः कृष्णः स परं ब्रह्म” – जो कृष्ण हैं वही परात्पर ब्रह्म हैं।
इसी प्रकार उनका नाम परात्पर सर्वमान्य हुआ। |