प्रामाणिक बुधवार व्रत कथा: पारंपरिक पाठ एवं विभिन्न संस्करणों का विस्तृत संकलन
१. कथा का पारंपरिक प्रारंभ
सनातन धर्म की सुदीर्घ और पावन परंपरा में व्रतों और उनसे जुड़ी कथाओं का अत्यंत विशिष्ट और आदरणीय स्थान है। शास्त्रों, पुराणों और लोक-श्रुतियों के अनुसार, किसी भी व्रत का पूर्ण और अक्षुण्ण फल तब तक प्राप्त नहीं होता, जब तक कि उस व्रत के अधिष्ठाता देवता की प्रामाणिक कथा का पूर्ण श्रद्धा, एकाग्रता और भक्ति-भाव से श्रवण या वाचन न किया जाए। बुधवार का व्रत मुख्य रूप से नवग्रहों में कुशाग्र बुद्धि के प्रदाता, विद्या और व्यापार के स्वामी भगवान बुधदेव तथा विघ्नहर्ता, मंगलमूर्ति भगवान श्री गणेश जी की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए किया जाता है ।
पारंपरिक रूप से यह कथा बुधवार के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु, अपने दैनिक कार्यों और स्नानादि से निवृत्त होकर, भगवान गणेश और बुधदेव की प्रतिमा अथवा चित्र के समक्ष बैठकर सुनते हैं । कथा श्रवण का पारंपरिक प्रसंग और आरंभिक वाक्य, जो पीढ़ियों से कथावाचकों और व्रत-पुस्तिकाओं द्वारा दोहराए जाते रहे हैं, इस प्रकार प्रारंभ होते हैं:
"हाथ में हरे पुष्प, साबुत मूंग, अक्षत और पवित्र जल लेकर भगवान श्री गणेश और नवग्रहों में श्रेष्ठ बुधदेव का ध्यान करें। हे शौनकादि ऋषियों! हे श्रोतागण! जो भी प्राणी इस नश्वर संसार में सुख, शांति, धन-धान्य, निरोगी काया और कुशाग्र बुद्धि की कामना करता है, उसे बुधवार का व्रत अवश्य करना चाहिए। इस व्रत के प्रभाव से सर्व-सुखों की सहज ही प्राप्ति होती है, जीवन में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं रहता, और कुंडली में बैठे अरिष्ट ग्रहों की पूर्ण शांति होती है । अब आप सभी एकाग्र चित्त होकर, बिना किसी अन्य विचार को मन में लाए, बुधवार व्रत की उन परम पावन कथाओं का श्रवण करें, जो मानव जीवन के समस्त कष्टों का निवारण करने वाली हैं और जिनका वाचन स्वयं देवर्षियों ने किया है।"
इस पावन प्रसंग के उपरांत, बुधवार व्रत से संबंधित जो भी प्रमुख कथाएं परंपरा में जीवित हैं, उनका वाचन किया जाता है। प्रामाणिकता और व्यापकता की दृष्टि से, बुधवार व्रत की प्रमुख कथाओं को निम्नलिखित तालिका में वर्गीकृत किया गया है:
| संस्करण का नाम | स्रोत / परंपरा | मुख्य पात्र | कथा का मूल प्रसंग एवं संदेश |
|---|---|---|---|
| व्यापारी (साहूकार) की कथा | पारंपरिक व्रत-पुस्तिकाएं एवं पौराणिक आधार | मधुसूदन (साहूकार), संगीता (पत्नी), बुधदेव | बुधवार को यात्रा निषेध का नियम, बुधदेव का प्रकोप, क्षमा-याचना और संकट-निवारण। |
| सास-बहू प्रसंग | लोक-प्रचलित प्रामाणिक परंपरा | क्रोधी सास, संस्कारी बहू, ब्राह्मण रूपी बुधदेव | पारिवारिक कलह, बुधदेव द्वारा मार्गदर्शन, व्रत के प्रभाव से सद्बुद्धि और शांति की प्राप्ति। |
| बुढ़िया माई और विघ्नहर्ता गणेश | लोक-श्रुति एवं जन-मान्यता | निर्धन बुढ़िया माई, भगवान श्री गणेश | निःस्वार्थ भक्ति, चमत्कारिक खीर, दरिद्रता का नाश और गणेश जी की असीम कृपा। |
| बुधदेव का जन्म (तारा-चंद्र प्रसंग) | भविष्य पुराण एवं अन्य पौराणिक ग्रंथ | देवगुरु बृहस्पति, तारा, चंद्रदेव, ब्रह्मा जी, बुध | तारकाम्यम युद्ध, बुधदेव की उत्पत्ति, ब्रह्मा जी द्वारा नामकरण और रौहिणेय की कथा। |
२. मुख्य कथा (पूर्ण एवं अक्षुण्ण रूप में)
प्रथम अध्याय: व्यापारी (साहूकार) और उसकी पत्नी की प्रामाणिक कथा
बुधवार व्रत के विधान में सबसे प्रमुख, सर्वाधिक प्रचलित और सबसे महत्वपूर्ण कथा समतापुर नगर के एक धनी व्यापारी की है। यह कथा इस बात का साक्षात प्रमाण है कि भगवान बुधदेव के नियमों का उल्लंघन करने और हठधर्मिता अपनाने से किस प्रकार के भयंकर संकट उत्पन्न होते हैं, और सच्चे मन से क्षमा-याचना करने पर कैसे उन संकटों का तत्काल निवारण होता है ।
पति-पत्नी का परिचय और ससुराल आगमन
प्राचीन काल की बात है, भारतवर्ष के एक अत्यंत समृद्ध और वैभवशाली नगर समतापुर में मधुसूदन नाम का एक अत्यंत धनवान साहूकार (व्यापारी) निवास करता था । उसके पास धन-धान्य, स्वर्ण-आभूषण और दास-दासियों की कोई कमी नहीं थी। उसका विवाह पास ही के बलरामपुर नगर की रहने वाली अत्यंत सुंदर, सुशील और सर्वगुणसंपन्न कन्या संगीता के साथ संपन्न हुआ था । विवाह के पश्चात कुछ समय अपने ससुराल में व्यतीत करके संगीता अपने मायके बलरामपुर वापस चली गई थी。
अपनी नई-नई शादी के कारण मधुसूदन अपनी पत्नी के वियोग को अधिक समय तक सहन नहीं कर सका। अपनी पत्नी को वापस अपने घर ले आने की अत्यंत उत्सुकता में, वह एक दिन अनेक प्रकार के उपहारों और एक सुसज्जित बैलगाड़ी (रथ) के साथ अपने ससुराल बलरामपुर जा पहुँचा । ससुराल में मधुसूदन का अत्यंत भव्य और राजसी स्वागत किया गया। उसकी खूब खातिरदारी की गई, उसे छप्पन प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन परोसे गए और उसने वहां अपने सास-ससुर के साथ कुछ दिन अत्यंत आनंदपूर्वक व्यतीत किए ।
बुधवार को यात्रा का हठ और चेतावनी का प्रसंग
कुछ दिन वहां सुखपूर्वक व्यतीत करने के पश्चात, मधुसूदन ने अपने सास-ससुर और अन्य श्रेष्ठजनों से अपनी पत्नी संगीता को विदा करने का आग्रह किया। संयोगवश और विधाता की लीला के अनुसार, जिस दिन उसने अपनी पत्नी की विदाई की बात कही, उस दिन बुधवार था ।
यह सुनकर उसके सास-ससुर अत्यंत चिंतित हो गए। घर के अन्य सगे-संबंधियों और वृद्धजनों ने भी मधुसूदन को बहुत समझाने का प्रयत्न किया। उन्होंने हाथ जोड़कर मधुसूदन से कहा, "हे दामाद जी! आप अत्यंत बुद्धिमान और समझदार हैं। परंतु आज बुधवार का पावन दिन है। हमारे शास्त्रों, लोक-मान्यताओं और पूर्वजों के वचनों के अनुसार, बुधवार के दिन घर की बेटी की विदाई कभी नहीं की जाती है। इस दिन किसी भी शुभ कार्य के लिए ससुराल से प्रस्थान करना, लंबी यात्रा पर निकलना या घर की कन्या को विदा करना अत्यंत अशुभ माना जाता है। इससे भगवान बुधदेव रुष्ट हो जाते हैं। कृपा करके आप आज का दिन यहीं विश्राम करें और कल गुरुवार की शुभ बेला में अपनी पत्नी को सुखपूर्वक विदा कराकर ले जाएं" ।
परन्तु मधुसूदन अत्यंत हठी, अभिमानी और अपने धन के मद में चूर था। उसने अपने सास-ससुर और वृद्धजनों की ज्ञानपूर्ण बातों को कोरा अंधविश्वास कहकर टाल दिया। उसने अत्यंत कठोर और उपहासपूर्ण शब्दों में कहा, "मैं इन सब शुभ-अशुभ बातों, वार-त्यौहार और शकुन-अपशकुन में तनिक भी यकीन नहीं करता। यह सब केवल मूर्खों की बातें हैं। मेरी जो इच्छा होगी, मैं वही करूंगा। मुझे आज ही और अभी अपनी पत्नी को लेकर अपने नगर प्रस्थान करना है" । उसकी इस भयंकर जिद और हठधर्मिता के आगे किसी की एक न चली। अंततः अत्यंत विवश होकर, भयभीत और भारी मन से उसके सास-ससुर को अपनी रोती हुई बेटी संगीता को बुधवार के दिन ही विदा करना पड़ा ।
नियम-भंग के कारण संकट और हमशक्ल का प्रकट होना
मधुसूदन अपनी पत्नी संगीता को लेकर अपनी सुसज्जित बैलगाड़ी में बैठकर अपने नगर समतापुर की ओर चल पड़ा । वे अभी कुछ ही कोस (दूरी) की यात्रा कर पाए थे कि भगवान बुधदेव के नियमों का सीधा उल्लंघन करने के भयंकर प्रकोप के कारण, उनकी बैलगाड़ी का एक मजबूत पहिया अचानक टूटकर बिखर गया । बैलगाड़ी के इस प्रकार टूट जाने के कारण अब उनके पास आगे की यात्रा पैदल ही करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं बचा था。
दोपहर का समय था और सूर्य देव अत्यंत प्रचंड रूप से तप रहे थे। रास्ते में पैदल चलते हुए कोमल शरीर वाली संगीता अत्यंत थक गई और उसे बहुत तेज प्यास लगी । उसने अपने पति से जल के लिए प्रार्थना की। मधुसूदन ने अपनी पत्नी की यह अवस्था देखकर उसे एक बड़े वृक्ष की घनी छांव में बैठाया, और स्वयं एक लोटा लेकर निकट के किसी जलाशय से उसके लिए जल लेने चला गया ।
कुछ समय पश्चात जब मधुसूदन जल लेकर वापस उस वृक्ष के पास लौटा, तो वहां का दृश्य देखकर उसके पैरों तले से जमीन खिसक गई और वह हतप्रभ रह गया। उसने अपनी आंखों से जो देखा, उस पर उसे विश्वास नहीं हो रहा था। उसने देखा कि बिल्कुल उसी की शक्ल-सूरत का, बिल्कुल उसी के जैसे वस्त्र धारण किए हुए, उसी के समान हाव-भाव वाला एक दूसरा व्यक्ति उसकी पत्नी संगीता के पास बैठा हुआ उससे मधुर स्वर में बातें कर रहा था ।
संगीता भी अपने पति जैसे दो-दो लोगों को एक साथ अपने सामने खड़ा देखकर अत्यंत असमंजस, दुविधा और घबराहट में पड़ गई। उसकी बुद्धि सुन्न हो गई कि उन दोनों में से उसका वास्तविक पति कौन है ।
असली मधुसूदन का क्रोध सातवें आसमान पर पहुँच गया। उसने जल का लोटा वहीं रखा और क्रोध से कांपते हुए उस दूसरे व्यक्ति (हमशक्ल) से पूछा, "अरे दुष्ट! तू कौन है जो मेरा वेश धारण करके मेरी पत्नी के पास इतनी धृष्टता से बैठा है?"
इस पर उस हमशक्ल व्यक्ति ने अत्यंत निडरता, निर्भयता और शांत स्वर में उत्तर दिया, "तू कौन है रे मूर्ख? यह संगीता मेरी पत्नी है। मैं समतापुर नगर का साहूकार मधुसूदन हूं और अपनी इस पत्नी को अभी-अभी उसके मायके बलरामपुर से विदा कराकर अपने घर ले जा रहा हूं। तू निश्चय ही कोई मायावी या चोर है जो मेरा वेश धरकर मेरी पत्नी का हरण करने यहां आया है!" ।
विवाद और राज-दरबार का न्याय
यह सुनते ही असली मधुसूदन का धैर्य जवाब दे गया और दोनों व्यक्तियों के बीच भयंकर विवाद, हाथापाई और झगड़ा उत्पन्न हो गया । दोनों ही स्वयं को असली मधुसूदन और संगीता का पति सिद्ध करने पर तुले हुए थे। जंगल के उस मार्ग पर दोनों के जोर-जोर से झगड़ने और चीखने-चिल्लाने की आवाजें सुनकर वहां से गुजरने वाले राहगीरों की भीड़ जमा हो गई。
उसी समय राज्य के कुछ सिपाही भी गश्त करते हुए वहां पहुँच गए । सिपाहियों ने भीड़ को हटाया और हाथ में लोटा लिए हुए असली मधुसूदन और उस हमशक्ल दोनों को पकड़ लिया । सिपाहियों के सेनापति ने संगीता की ओर देखकर पूछा, "हे भद्रे! तुम ही सत्य बताओ, इन दोनों समान दिखने वाले पुरुषों में से तुम्हारा असली पति कौन है? हम उसी क्षण दूसरे बहरूपिये को मृत्युदंड दे देंगे।"
परन्तु बेचारी पत्नी क्या उत्तर देती? वह शांत ही रही और फूट-फूट कर रोने लगी, क्योंकि दोनों व्यक्ति देखने में, बोलने में और व्यवहार में बिल्कुल एक समान थे और वह स्वयं इस भयंकर भ्रम को नहीं सुलझा पा रही थी । कोई अन्य मार्ग न देखकर सिपाही उन दोनों पुरुषों और उस स्त्री को पकड़कर नगर के राजा के दरबार में ले गए。
राजा के दरबार में भी यह अद्भुत दृश्य देखकर सभी दरबारी स्तब्ध रह गए। राजा ने भी बहुत प्रयास किया, अनेक प्रकार के प्रश्न पूछे, परंतु असली और नकली की पहचान नहीं हो सकी। दोनों ही पुरुष मधुसूदन के जीवन के हर रहस्य को समान रूप से बता रहे थे। अंततः न्याय न कर पाने की स्थिति में और इस रहस्य को सुलझाने में स्वयं को असमर्थ पाकर, राजा ने क्रोधित होकर आदेश सुना दिया कि "इन दोनों ही पुरुषों को भयंकर कारागार (जेल) में डाल दिया जाए, कल प्रातः काल इनका निर्णय किया जाएगा" ।
पश्चाताप, आकाशवाणी और संकट-निवारण
राजा का यह कठोर दंड सुनकर असली मधुसूदन अत्यंत भयभीत हो उठा। उसे अपने प्राणों का संकट दिखाई देने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था कि यह कैसा मायाजाल है जिसमें वह निर्दोष होते हुए भी फंस गया है। संकट की इस गहन घड़ी में मधुसूदन का अहंकार पूरी तरह से टूट चुका था। उसने राज-दरबार में ही घुटनों के बल बैठकर, हाथ जोड़कर ईश्वर से अत्यंत करुण स्वर में प्रार्थना की, "हे परमेश्वर! हे त्रिलोकीनाथ! यह क्या अद्भुत और भयंकर लीला है कि सच्चा व्यक्ति झूठा बन रहा है और झूठा व्यक्ति सच्चा सिद्ध हो रहा है? मेरी रक्षा करें प्रभु!" ।
जैसे ही उसने अपने हृदय की गहराइयों से सच्चे मन से प्रार्थना की, तभी पूरे राज-दरबार में गूंजती हुई एक अत्यंत स्पष्ट और दिव्य आकाशवाणी हुई: "अरे मूर्ख और अभिमानी मधुसूदन! यह सब तेरी ही भारी भूल और हठधर्मिता का नतीजा है। तूने अपने वृद्ध सास-ससुर के बार-बार मना करने के बावजूद उनकी बात नहीं मानी और बुधवार के पावन दिन यात्रा की । तूने अहंकारवश मेरे नियमों का और मेरा घोर निरादर किया है। यह सब लीला स्वयं मैंने, अर्थात् भगवान बुधदेव ने रची है। मैंने ही तेरे अहंकार को नष्ट करने और तुझे सत्य का मार्ग दिखाने के लिए यह हमशक्ल रूप धारण किया है" ।
यह गंभीर और दिव्य आकाशवाणी सुनकर मधुसूदन के नेत्रों से अश्रु बहने लगे। उसे अपनी भूल का गहरा भान हुआ। उसने अत्यंत करुण और कातर स्वर में पृथ्वी पर दंडवत होकर भगवान बुधदेव से क्षमा याचना की और कहा, "हे दयानिधान! हे भगवान बुधदेव! मुझे अज्ञानी को क्षमा कर दीजिए। मुझसे अत्यंत भारी भूल हुई है जो मैंने आपके शुभ दिन का अनादर किया। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि भविष्य में कभी भी बुधवार के दिन किसी शुभ कार्य के लिए यात्रा नहीं करूंगा, किसी को विदा नहीं करूंगा, और आज से आजीवन सदैव नियमपूर्वक आपका व्रत किया करूंगा। हे प्रभु! मेरी रक्षा करें।" ।
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन और सुख-समृद्धि
मधुसूदन के सच्चे मन से क्षमा मांगने, अपना अहंकार त्यागने और प्रार्थना करने पर दयालु भगवान बुधदेव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे तत्काल क्षमा कर दिया । उसी क्षण, देखते ही देखते राजा और सभी दरबारियों के सामने से वह दूसरा हमशक्ल व्यक्ति (जो स्वयं भगवान बुधदेव का स्वरूप था) वायु में विलीन होकर अंतर्ध्यान हो गया ।
यह प्रत्यक्ष चमत्कार देखकर राजा सहित दरबार में उपस्थित सभी लोग हैरान रह गए और उन्होंने भगवान बुधदेव की जय-जयकार की। भगवान बुधदेव की इस महान अनुकंपा को देखकर राजा ने असली मधुसूदन और उसकी पत्नी संगीता को ससम्मान कारागार से मुक्त किया, उन्हें बहुमूल्य वस्त्र और आभूषण भेंट किए और अत्यंत सम्मानपूर्वक विदा किया ।
जब मधुसूदन और संगीता राजमहल से बाहर निकले और कुछ দূরে आगे चले, तो उन्होंने देखा कि रास्ते में उन्हें अपनी वही बैलगाड़ी पुनः मिल गई है, और चमत्कारिक रूप से उसका जो मजबूत पहिया टूट गया था, वह स्वयं ही जुड़ चुका था । दोनों पति-पत्नी अत्यंत प्रसन्नचित्त होकर उस बैलगाड़ी में बैठकर आनंदपूर्वक अपने नगर समतापुर की ओर चल दिए。
घर पहुँचकर मधुसूदन और संगीता ने अपने जीवन का नियम बना लिया। वे हर सप्ताह नियमपूर्वक बुधवार का व्रत करने लगे। भगवान बुधदेव की कृपा से उनके घर में अन्न और धन-संपत्ति की निरंतर वर्षा होने लगी। उनके जीवन से सभी प्रकार के कष्ट, दरिद्रता और बाधाएं सदा के लिए मिट गईं और वे अपना शेष जीवन अपार आनंद, सुख-समृद्धि और भगवान की भक्ति के साथ व्यतीत करने लगे ।
द्वितीय अध्याय: सास-बहू और बुधदेव प्रसंग (लोक-प्रचलित प्रामाणिक कथा)
बुधवार के व्रत के संदर्भ में सनातन लोक-परंपरा में एक और अत्यंत पावन कथा सदियों से प्रचलित है, जो विशेष रूप से पारिवारिक कलह के निवारण, घर में सुख-शांति की स्थापना और सद्बुद्धि की प्राप्ति से संबंधित है। यह "सास-बहू" संस्करण मुख्य रूप से यह दर्शाता है कि भगवान बुधदेव की कृपा से किस प्रकार कठोरतम हृदय भी पिघल जाता है और वाणी में मधुरता आती है । (यह कथा विशुद्ध लोक-परंपरा पर आधारित है और इसका वाचन पारिवारिक शांति और समृद्धि की कामना के लिए किया जाता है)।
सास-बहू का परिचय और भयंकर गृह-क्लेश
प्राचीन काल की बात है, एक समृद्ध नगर में एक अत्यंत धनी साहूकार अपनी पत्नी (सास), अपने एकमात्र पुत्र और अपनी नवविवाहिता पुत्रवधू (बहू) के साथ एक विशाल भवन में निवास करता था । साहूकार की पत्नी (यानी सास) का स्वभाव अत्यंत कठोर, क्रोधी और चिड़चिड़ा था। बिना किसी कारण के बात-बात पर क्रोध करना, अपशब्द कहना और अपनी बहू को ताने मारना उसकी दिनचर्या बन चुकी थी। इसके ठीक विपरीत, उसकी पुत्रवधू अत्यंत संस्कारी, धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाली, ईश्वर-भक्त और अत्यंत शांत स्वभाव की कन्या थी ।
घर में आए दिन, प्रातःकाल से लेकर रात्रिकाल तक, किसी न किसी छोटी-सी बात को लेकर सास और बहू के बीच अनबन और क्लेश होता रहता था। सास के निरंतर तानों और प्रताड़ना के कारण बहू का जीवन नर्क के समान हो गया था। इस नित्य के क्लेश के कारण घर की सुख-शांति पूरी तरह से नष्ट हो चुकी थी। जिस घर में कलह होती है, वहां से लक्ष्मी रूठ जाती हैं, इसी तर्ज पर उस समृद्ध घर में भी धन-धान्य में भारी कमी आने लगी थी और साहूकार का व्यापार भी मंदी की ओर जाने लगा था ।
बुधदेव का प्रत्यक्ष मार्गदर्शन और उपाय
एक बार की बात है, अपनी सास के कटु वचनों और अकारण दी गई प्रताड़ना से अत्यंत आहत होकर, बहू रोती हुई घर से निकली और नगर के एक प्राचीन मंदिर के एकांत कोने में बैठकर फूट-फूट कर रोने लगी। वह ईश्वर से अपने प्राण हर लेने की याचना कर रही थी। उसी समय वहां से एक अत्यंत तेजस्वी, श्वेत वस्त्र धारण किए हुए, हाथ में कमंडल लिए एक वृद्ध ब्राह्मण गुजरे। (कथा के अनुसार, वह ब्राह्मण कोई और नहीं, बल्कि अपने भक्तों के दुःख दूर करने वाले स्वयं भगवान बुधदेव का ही स्वरूप थे) ।
वृद्ध ब्राह्मण ने उस संस्कारी स्त्री को इस प्रकार एकांत में विलाप करते हुए देखकर अत्यंत करुण स्वर में उसके दुःख का कारण पूछा。
बहू ने ब्राह्मण को देवता के समान जानकर हाथ जोड़कर अपनी सारी व्यथा कह सुनाई: "हे महाराज! हे विप्रदेव! मेरी सास मुझ पर अकारण ही हमेशा क्रोध करती रहती हैं। मैं चाहे जितना भी अच्छा कार्य कर लूं, उनके मुख से मेरे लिए केवल विष ही निकलता है। इस भयंकर क्लेश के कारण हमारे घर की बरकत भी समाप्त हो गई है और मेरे पति का व्यापार भी चौपट हो रहा है। कृपा करके मुझे कोई ऐसा मार्ग, कोई ऐसा व्रत या अनुष्ठान बताएं जिससे मेरे घर में शांति वापस आ सके और मेरी सास का हृदय परिवर्तित हो जाए" ।
ब्राह्मण रूपी भगवान बुधदेव ने अत्यंत प्रेमपूर्वक मुसकुराते हुए कहा, "हे पुत्री! तुम तनिक भी शोक न करो। तुम आगामी शुक्ल पक्ष से प्रत्येक बुधवार को भगवान बुधदेव का व्रत करना आरंभ करो। बुध ग्रह नवग्रहों के राजकुमार हैं और वे बुद्धि, विवेक और वाणी के अधिष्ठाता देवता हैं। उनके शुभ प्रभाव से तुम्हारी सास की दूषित बुद्धि शुद्ध होगी, उनका क्रोध शांत होगा और उनकी वाणी में मधुरता आएगी" । इसके पश्चात उस वृद्ध ब्राह्मण ने उसे व्रत की संपूर्ण पारंपरिक विधि, मूंग की दाल के उपयोग और दान का विधान बताया और वहां से अंतर्ध्यान हो गए。
श्रद्धापूर्वक व्रत-पालन और चमत्कारिक प्रभाव
ब्राह्मण के वचनों पर पूर्ण विश्वास करते हुए, आगामी बुधवार से ही बहू ने नियमपूर्वक बुधवार का व्रत रखना प्रारंभ कर दिया। वह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि से निवृत्त होती, पवित्र हरे रंग के वस्त्र धारण करती और भगवान गणेश तथा बुधदेव की प्रतिमा के समक्ष बैठकर पूरे विधि-विधान से उनकी पूजा करती । पूजा में वह विशेष रूप से हरी मूंग की दाल, गुड़ और पंचामृत का भोग लगाती थी और पूरे दिन भगवान का स्मरण करती थी。
प्रारंभ में जब सास ने बहू को यह नया व्रत करते देखा, तो उसने अपनी आदत के अनुसार बहुत टोका-टाकी की और उपहास उड़ाते हुए कठोर वचनों में कहा, "अरी ओ कामचोर! इन व्रतों और पाखंडों से कुछ नहीं होने वाला। यह सब घर के काम से बचने के बहाने हैं, जाकर घर के काम पर ध्यान दे।" परन्तु संस्कारी बहू ने सास की किसी भी कटु बात का तनिक भी प्रतिकार नहीं किया; वह पूर्ण रूप से मौन रहकर मन ही मन बुधदेव का स्मरण करती रही और क्षमा मांगती रही ।
कुछ ही सप्ताह व्यतीत हुए थे कि भगवान बुधदेव की कृपा से उस घर में अद्भुत और अकल्पनीय चमत्कार होने लगा। सबसे पहले तो साहूकार के व्यापार में, जो लंबे समय से भयंकर घाटे में चल रहा था, अचानक भारी धन-लाभ होने लगा। घर में फिर से वैभव लौटने लगा。
एक बुधवार के दिन जब बहू अपने पूजा-कच्छ में बैठी पूरी श्रद्धा से भगवान बुधदेव की पूजा कर रही थी, तो सास वहां से गुजरी। बुधदेव की माया से सास का हृदय अचानक परिवर्तित हुआ और वह मंत्रमुग्ध होकर वहीं पूजा देखने बैठ गई । पूजा संपन्न होने पर बहू ने अत्यंत सत्कार के साथ अपनी सास को भगवान का प्रसाद (गुड़, दही और मूंग की पंजीरी) प्रदान किया। जैसे ही सास ने भगवान बुधदेव का वह पवित्र प्रसाद ग्रहण किया, उसके मन का सारा अंधकार, सारा क्रोध और सारी ईर्ष्या उसी क्षण शांत हो गई । उसका मन ऐसा निर्मल हो गया जैसे गंगाजल。
चेतावनी, हृदय-परिवर्तन और सुखद अंत
उसी रात्रि सास जब सो रही थी, तो उसे स्वप्न में साक्षात भगवान बुधदेव के दर्शन हुए। बुधदेव ने अत्यंत ओजस्वी स्वर में स्वप्न में उससे कहा, "अरी अज्ञानी स्त्री! तुम्हारी इस संस्कारी बहू की असीम भक्ति, सहनशीलता और बुधवार के व्रत के महान प्रभाव से ही तुम्हारे घर में यह धन-संपत्ति और शांति पुनः लौटी है, अन्यथा तुम्हारे क्लेश ने तो इस घर को भस्म कर दिया था। यदि तुम आज से गृह-कलह त्याग दोगी और अपनी बहू को पुत्री के समान प्रेम करोगी, तो तुम्हारे परिवार का यश और ऐश्वर्य तीनों लोकों में और अधिक बढ़ेगा" ।
अगले दिन प्रातः काल उठते ही सास की आंखों से पश्चाताप के आंसू बह रहे थे। उसने दौड़कर अपनी बहू को हृदय से लगा लिया और अपने पिछले सभी कठोर व्यवहारों और कटु वचनों के लिए फूट-फूट कर क्षमा मांगी । बहू ने भी अपनी सास के चरण स्पर्श किए। इसके पश्चात सास और बहू दोनों मिलकर, एक ही आसन पर बैठकर प्रत्येक बुधवार को भगवान बुधदेव का व्रत करने लगीं और पूर्ण श्रद्धा से कथा का श्रवण करने लगीं。
भगवान बुधदेव की कृपा से उस घर से कलह और दरिद्रता का सदा के लिए नाश हो गया और वह घर सदैव के लिए असीम खुशियों, प्रेम और ऐश्वर्य से परिपूर्ण हो गया ।
तृतीय अध्याय: बुढ़िया माई और विघ्नहर्ता श्री गणेश की लोककथा
बुधवार का पावन दिन नवग्रहों में बुधदेव के साथ-साथ शिव-पार्वती के लाडले पुत्र, प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश जी को भी पूर्ण रूप से समर्पित है। अतः लोक-परंपराओं में बुधवार के दिन व्रत रखने वाले श्रद्धालु गणेश जी की यह अत्यंत चमत्कारी कथा भी अनिवार्य रूप से सुनते हैं, जो यह दर्शाती है कि भगवान गणेश अपने सच्चे और भोले भक्तों के सभी कष्ट कैसे हर लेते हैं । (यह कथा भारत के विभिन्न अंचलों में विशुद्ध लोक-मान्यता और जनश्रुति के रूप में पीढ़ियों से गाई और सुनाई जाती रही है)।
बुढ़िया माई की असीम निःस्वार्थ भक्ति
एक समय की बात है, किसी दूर-दराज के गाँव में एक अत्यंत निर्धन, वृद्ध बुढ़िया माई रहती थी। उसके पास धन-संपत्ति के नाम पर एक फूटी कौड़ी भी नहीं थी, वह मांगकर अपना गुजारा करती थी। परंतु वह भगवान गणेश जी की परम और अनन्य भक्त थी। वह नित्य प्रति उनकी आराधना किया करती थी। वह अत्यंत गरीब थी, फिर भी दिन भर में जो कुछ रूखा-सूखा अन्न उसे प्राप्त होता, वह पहले उसका भोग भगवान गणेश जी की एक मिट्टी की मूर्ति को लगाती, और उसके पश्चात ही स्वयं उसे प्रसाद रूप में ग्रहण करती थी。
एक बार बुढ़िया माई के मन में अत्यंत तीव्र इच्छा उत्पन्न हुई कि वह भगवान गणेश जी के निमित्त श्रद्धापूर्वक मीठी खीर बनाए और भगवान को भोग लगाए। उसने किसी प्रकार मांग-जांच कर थोड़ा सा दूध, चावल और गुड़ एकत्रित किया और अत्यंत प्रेम से खीर बनाई। जब उसने गणेश जी को भोग लगाया, तो उसके भोले मन में विचार आया कि "मैं अकेली यह खीर क्यों खाऊं? मैं यह खीर सारे गाँव को खिलाऊंगी।"
अपनी इसी भोली भावना में उसने जाकर पूरे गाँव वालों को निमंत्रण दे दिया कि "आज मेरे घर गणेश जी का प्रसाद है, आप सभी खीर खाने अवश्य आएं।" गाँव वाले हंसने लगे कि जो बुढ़िया स्वयं दाने-दाने को मोहताज है, वह पूरे गाँव को खीर कैसे खिलाएगी? परंतु फिर भी वे सभी तमाशा देखने के लिए उसके घर पहुँच गए。
चमत्कार और दरिद्रता का सर्वनाश
बुढ़िया माई की कुटिया में खीर का पात्र अत्यंत छोटा था, परंतु भगवान श्री गणेश जी अपनी इस भक्त की सच्ची भावना देखकर अत्यंत द्रवित हो गए। उन्होंने अपनी रिद्धि-सिद्धि के प्रभाव से उस छोटे से पात्र में कभी न समाप्त होने वाली बरकत ला दी。
बुढ़िया माई ने गाँव वालों को पंगत में बैठाया और खीर परोसना आरंभ किया। सारा गाँव जी भरकर स्वादिष्ट खीर खा चुका था, सभी तृप्त होकर अपने-अपने घर लौट गए, फिर भी बुढ़िया माई के उस छोटे से पात्र में ढेर सारी खीर बच गई । अब बुढ़िया माई अत्यंत चिंतित हो गई कि इतनी सारी बची हुई खीर का वह क्या करे, इसे फेंकना तो भगवान के प्रसाद का घोर अपमान होगा。
तभी साक्षात भगवान गणेश जी ने सूक्ष्म रूप में (आकाशवाणी के समान) उसे प्रेरणा दी और कहा, "हे माई! तू तनिक भी चिंता मत कर। इस बची हुई खीर को तू आज रात में अपने घर के चारों कोनों में रख देना" ।
बुढ़िया माई ने अपने इष्ट भगवान की आज्ञा मानकर ठीक वैसा ही किया। उसने खीर को छोटे-छोटे पात्रों में निकाला और अपनी कच्ची कुटिया के चारों तरफ और कोनों में रख दिया और सो गई。
अगले दिन सुबह उठकर जब बुढ़िया माई ने अपनी कुटिया के कोनों की ओर देखा, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गईं। उसे अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हो रहा था। पतीले और पात्रों में जहां उसने रात को बची हुई खीर रखी थी, उस स्थान पर हीरे, जवाहरात, अमूल्य मोती और स्वर्ण-मुद्राएं भर गए थे । भगवान गणेश जी ने खीर के एक-एक दाने को मोतियों में परिवर्तित कर दिया था。
बुढ़िया माई यह ईश्वरीय चमत्कार देखकर अत्यंत भावविभोर हो उठी और भगवान के चरणों में गिर पड़ी। उसकी जन्म-जन्मांतर की भयंकर दरिद्रता सदा के लिए दूर हो गई और वह अपार सुख-सुविधाओं से संपन्न हो गई。
उस अपार धन से बुढ़िया माई ने स्वयं के सुख-भोग के लिए कुछ नहीं किया, बल्कि उसने सारा धन जन-कल्याण में लगा दिया। उसने भगवान गणपति जी का एक अत्यंत भव्य और विशाल मंदिर बनवाया और राहगीरों तथा पशु-पक्षियों के कल्याण के लिए एक बड़ा सा तालाब भी खुदवाया ।
उसने मंदिर के विशाल प्रांगण में बड़ (बरगद), पीपल और आकड़े के पवित्र वृक्ष लगवाए और वैशाख के पवित्र माह में उन्हें नित्य अपने हाथों से सींचने लगी । इस महान धार्मिक कार्य के कारण बुढ़िया माई का नाम दूर-दूर तक प्रसिद्ध हो गया। उस पवित्र स्थान पर वार्षिक मेला लगने लगा और लोग दूर-दूर से भगवान गणेश जी की असीम कृपा प्राप्त करने के लिए वहां आने लगे। भगवान गणेश वहां आने वाले सभी सच्चे भक्तों की मनोकामनाएं पूरी करने लगे ।
(कथा के अंत में कथावाचक यह उद्घोष करता है:) "प्रिय भक्तों! जैसी असीम कृपा विघ्नहर्ता गणेश भगवान ने निर्धन बुढ़िया माई पर की, वैसी ही कृपा इस पावन कथा को कहने वाले, सुनने वाले और बीच-बीच में हुंकारा भरने वाले सभी प्राणियों पर करना। बोलिए गणपति भगवान की जय!" ।
चतुर्थ अध्याय: बुधदेव का जन्म और पौराणिक प्रसंग (तारा-चंद्र आख्यान)
बुधवार के व्रत में जिस बुध ग्रह की शांति और प्रसन्नता के लिए आराधना की जाती है, उन बुधदेव के जन्म और उत्पत्ति की यह कथा पुराणों (भविष्य पुराण, शिव पुराण आदि) में अत्यंत विस्तार से वर्णित है। यह कथा इस प्रकार है :
तारा और चंद्रमा का प्रसंग
अत्यंत प्राचीन पौराणिक काल में, महर्षि अंगिरा के पुत्र देवगुरु बृहस्पति स्वर्ग लोक में सभी देवताओं के मार्गदर्शक और परम गुरु थे। नवग्रहों में से एक, अत्यंत रूपवान और कांतिमान चंद्रमा (चंद्रदेव) देवगुरु बृहस्पति के आश्रम में विद्याध्ययन करने वाले उनके अत्यंत मेधावी शिष्यों में से एक थे। देवगुरु बृहस्पति की पत्नी का नाम तारा था, जो रूप, लावण्य और यौवन में पूरे स्वर्ग लोक में अद्वितीय थीं ।
एक बार की बात है, गुरु-पत्नी तारा ने युवा चंद्रमा को देखा और वे चंद्रमा के मनमोहक रूप, सौम्यता और असीम तेज पर पूरी तरह से मोहित हो गईं। चंद्रमा भी अपनी मर्यादा और गुरु-शिष्य की परंपरा को भूलकर अपने गुरु की पत्नी के प्रेम में पड़ गए। यह प्रेम इतना प्रगाढ़ और अंधा हो गया कि देवी तारा ने सामाजिक और देव-मर्यादाओं को तोड़कर अपने पति देवगुरु बृहस्पति का भवन छोड़ दिया और चंद्रमा के साथ उनके लोक में जाकर रहने लगीं ।
तारकाम्यम युद्ध और ब्रह्मा जी का हस्तक्षेप
जब देवगुरु बृहस्पति को अपनी पत्नी के इस कृत्य का भान हुआ, तो वे अत्यंत आहत हुए और क्रोध की अग्नि में जल उठे। उन्होंने अपने दूतों के माध्यम से तारा को बहुत समझाया कि वह अपनी भूल सुधार कर वापस लौट आएं, परन्तु तारा चंद्रमा के सम्मोहन में ऐसी बंधी थीं कि उन्होंने किसी भी शर्त पर वापस आने से स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया。
अपनी पत्नी के इस घोर अपमान से क्षुब्ध होकर देवगुरु बृहस्पति ने चंद्रमा के विरुद्ध एक भयंकर युद्ध की घोषणा कर दी । चूंकि बृहस्पति देवताओं के परम गुरु थे, इसलिए स्वर्ग के देवराज इंद्र सहित सभी देवताओं ने अपने गुरु के सम्मान की रक्षा के लिए उनका पक्ष लिया और अस्त्र-शस्त्र उठा लिए。
दूसरी ओर, दैत्यों के गुरु शुक्राचार्य, जो बृहस्पति के चिर-प्रतिद्वंद्वी थे, उन्होंने 'शत्रु का शत्रु अपना मित्र होता है' इस कूटनीति के तहत चंद्रमा का पक्ष लिया और दैत्यों की सेना चंद्रमा के समर्थन में उतार दी । भगवान शिव ने भी बृहस्पति का साथ दिया। गुरु-पत्नी तारा को लेकर देवों और दानवों के बीच हुए इस भयंकर, विनाशकारी और प्रलयंकारी युद्ध को पुराणों में 'तारकाम्यम युद्ध' (तारा के निमित्त हुआ युद्ध) कहा गया है ।
इस युद्ध के कारण सम्पूर्ण सृष्टि में भयंकर हाहाकार मच गया। ब्रह्मांड के नष्ट होने का भय उत्पन्न हो गया। सृष्टि को इस प्रकार अकारण नष्ट होता देख अंततः सृष्टिकर्ता भगवान ब्रह्मा जी को स्वयं युद्ध-भूमि में उतरकर हस्तक्षेप करना पड़ा ।
ब्रह्मा जी ने अपने तपोबल से युद्ध को रुकवाया। उन्होंने चंद्रमा को उनके इस अनैतिक कृत्य के लिए कड़ी फटकार लगाई और उन्हें धर्म का उपदेश दिया। ब्रह्मा जी के आदेश पर तारा को विवश होकर वापस देवगुरु बृहस्पति के पास भेज दिया गया ।
बुधदेव का जन्म और नामकरण
बृहस्पति के पास वापस आने के कुछ समय पश्चात ही, देवी तारा ने एक अत्यंत सुंदर, कांतिमान, स्वर्ण के समान दमकते हुए और सूर्य के समान तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया । उस नवजात बालक का तेज और आकर्षण इतना अद्भुत था कि उसे देखते ही चंद्रमा और बृहस्पति, दोनों ही उस बालक को अपना रक्त और अपना पुत्र मानकर उस पर अपना अधिकार जताने लगे。
जब यह विवाद पुनः भयंकर रूप लेने लगा, तब वह नवजात बालक (जो जन्म से ही अत्यंत ज्ञानी था) स्वयं क्रोधित होकर बोल पड़ा और उसने अपनी माता तारा से सत्य बताने का कड़ाई से आग्रह किया। तब परमपिता ब्रह्मा जी की उपस्थिति में, सभी देवताओं के समक्ष माता तारा ने अत्यंत लज्जित होते हुए और सिर झुकाकर यह स्वीकार किया कि यह तेजस्वी बालक देवगुरु बृहस्पति का नहीं, अपितु चंद्रमा का ही पुत्र है ।
यह सत्य जानकर कि वह उनका ही पुत्र है, चंद्रमा अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने बालक को अपने गले से लगा लिया। उस छोटे से बालक की असाधारण, अति-गंभीर और कुशाग्र बुद्धि को देखकर भगवान ब्रह्मा जी अत्यंत प्रभावित हुए और उन्होंने स्वयं उस बालक का नाम 'बुध' (अर्थात् बुद्धिमान / ज्ञानवान) रखा ।
चूंकि तारा वापस बृहस्पति के पास जा चुकी थीं, इसलिए बुध के पालन-पोषण का दायित्व चंद्रमा ने अपनी सर्वाधिक प्रिय पत्नी 'रोहिणी' को सौंप दिया। माता रोहिणी द्वारा अत्यंत लाड़-प्यार से पालित होने के कारण भगवान बुधदेव को पुराणों में 'रौहिणेय' भी कहा जाता है ।
आगे चलकर भगवान बुधदेव अत्यंत पराक्रमी और ज्ञानी हुए। उनका विवाह वैवस्वत मनु की परम सुंदरी पुत्री 'इला' से संपन्न हुआ, जिनसे 'पुरूरवा' नामक प्रतापी पुत्र का जन्म हुआ। इसी पुरूरवा के वंश से आगे चलकर भारतवर्ष के महान 'चन्द्रवंश' का विस्तार हुआ, जिसमें अनेक प्रतापी राजाओं ने जन्म लिया ।
(बुध ग्रह भगवान विष्णु के प्रतिनिधि माने जाते हैं और मानव जीवन में बुद्धि, वाणी, व्यापार और तर्क-शक्ति पर इनकी पूर्ण सत्ता है। इसी कारण इनकी प्रसन्नता और कृपा-प्राप्ति हेतु बुधवार का यह महाव्रत रखा जाता है)।
३. पारंपरिक उपसंहार एवं फल-श्रुति (Phal-shruti)
बुधवार की इन सभी पावन और कल्याणकारी कथाओं के वाचन अथवा श्रवण के पश्चात, सनातन परंपरा के अनुसार कथा के अंत में पारंपरिक फल-श्रुति (क कथा सुनने का फल) का पाठ अनिवार्य रूप से किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस फल-वचन को पढ़े बिना कथा अधूरी रहती है。
कथावाचक अथवा व्रती हाथ में लिए हुए पुष्प और अक्षत भगवान के चरणों में अर्पित करते हैं और इस पारंपरिक फल-वचन का पाठ करते हैं:
"हे श्रोतागण! जो कोई भी स्त्री अथवा पुरुष पूर्ण श्रद्धा, विश्वास और नियमपूर्वक भगवान बुधदेव और श्री गणेश जी का यह बुधवार व्रत करता है, और इस पावन कथा को पढ़ता अथवा श्रवण करता है, उसे इस लोक में सर्व-सुखों की प्राप्ति होती है और परलोक में वह उत्तम गति को प्राप्त करता है ।
जो व्यक्ति पूर्ण भक्ति-भाव से इस कथा को श्रवण करता है तथा अन्यों को सुनाता है, उसको बुधवार के दिन यात्रा (गमन) करने से कोई दोष नहीं लगता । भगवान बुधदेव की अनुकंपा से उसके घर में अन्न, धन और संपत्ति की अविरल वर्षा होती है。
उसके जीवन से दरिद्रता, पारिवारिक कलह और व्यापारिक कष्ट सदा के लिए दूर हो जाते हैं । उसकी कुंडली में बैठे समस्त अरिष्ट ग्रहों की पूर्ण शांति होती है, उसे कुशाग्र बुद्धि और मधुर वाणी की प्राप्ति होती है, और अंततः वह असीम पुण्य का भागी बनता है ।
अतः हे भवानी-नंदन श्री गणेश! हे देवों में कुशाग्र श्री बुधदेव! जैसी असीम कृपा आपने समतापुर के साहूकार मधुसूदन पर की, जैसी सद्बुद्धि और शांति आपने सास-बहू को प्रदान की, और जिस प्रकार आपने निर्धन बुढ़िया माई के भंडारे मोतियों से भर दिए, वैसी ही कृपा इस कथा को कहने वाले, सुनने वाले और बीच-बीच में हुंकारा भरने वाले सभी जातकों पर करना। उन सबका सदैव कल्याण करना।"
(इसके पश्चात उपस्थित सभी जन हाथ जोड़कर भगवान गणेश और बुधदेव की जय-जयकार करते हैं। 'जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा...' तथा 'आरती युगलकिशोर की कीजै...' गाकर आरती संपन्न की जाती है और प्रसाद वितरण के साथ बुधवार व्रत की इस कथा का पारंपरिक रूप से विश्राम होता है ।)
॥ इति बुधवार व्रत कथा संपूर्णम् ॥