विस्तृत उत्तर
अग्निहोत्र और हवन में गोबर के कण्डों (उपलों) का प्रयोग वैदिक काल से चली आ रही परम्परा है। इसके धार्मिक और व्यावहारिक दोनों कारण हैं।
धार्मिक कारण
1गाय की पवित्रता
सनातन धर्म में गाय को 'कामधेनु' और देवी स्वरूप माना गया है। गाय के पंचगव्य (दूध, दही, घी, गोमूत्र, गोबर) सभी पवित्र माने गए हैं। अतः गोबर से बने कण्डे यज्ञ अग्नि के लिए सबसे उपयुक्त ईंधन हैं।
2शास्त्रीय विधान
वैदिक यज्ञों में समिधा (ईंधन) के लिए विशिष्ट वृक्षों की लकड़ी (पलाश, आम, पीपल, बिल्व आदि) और गोबर के कण्डों का विधान है।
व्यावहारिक/वैज्ञानिक कारण
3धीमी और स्थिर अग्नि
गोबर के कण्डे धीमी, स्थिर और लम्बे समय तक जलने वाली अग्नि देते हैं — यज्ञ के लिए उपयुक्त।
4वायु शुद्धिकरण
आधुनिक शोधों में पाया गया है कि गोबर के कण्डों को घी के साथ जलाने से वातावरण में ऑक्सीजन का स्तर बढ़ता है, हानिकारक जीवाणु नष्ट होते हैं, और फॉर्मलडिहाइड जैसे प्रदूषक अवशोषित होते हैं। (ये दावे कुछ शोधों पर आधारित हैं, सार्वभौमिक वैज्ञानिक सहमति अभी विकसित हो रही है।)
5उपलब्धता
भारतीय ग्रामीण परम्परा में गोबर के कण्डे सर्वसुलभ ईंधन हैं।
6कम धुआँ
सूखे गोबर कण्डे लकड़ी की तुलना में कम धुआँ उत्पन्न करते हैं।
ध्यान रखें: केवल देशी गाय के गोबर से बने, पूर्णतः सूखे कण्डों का प्रयोग करना चाहिए।