विस्तृत उत्तर
अग्निहोत्र वैदिक धर्म का सबसे मूलभूत नित्य यज्ञ है जो प्रतिदिन दो बार — प्रातःकाल और सायंकाल — किया जाता है।
सही समय
1प्रातः अग्निहोत्र
सूर्योदय के ठीक समय पर। शास्त्रीय विधान में सूर्य की पहली किरण दिखते ही आहुति दी जाती है।
- ▸मंत्र: 'सूर्याय स्वाहा, सूर्याय इदं न मम। प्रजापतये स्वाहा, प्रजापतये इदं न मम।'
2सायं अग्निहोत्र
सूर्यास्त के ठीक समय पर। सूर्य अस्त होते ही आहुति।
- ▸मंत्र: 'अग्नये स्वाहा, अग्नये इदं न मम। प्रजापतये स्वाहा, प्रजापतये इदं न मम।'
क्यों ये दो समय?
प्रातः और सायं — ये दोनों संधिकाल हैं (दिन-रात का मिलन)। शतपथ ब्राह्मण में अग्निहोत्र को नित्यकर्म बताया गया है जो गृहस्थ के लिए अनिवार्य है।
विधि (संक्षिप्त)
- ▸गोबर के कण्डों या आम/पलाश की समिधाओं से अग्नि प्रज्वलित करें।
- ▸उल्टे पिरामिड आकार के ताँबे या मिट्टी के कुण्ड में।
- ▸गाय के घी और चावल (अक्षत) से आहुति दें।
- ▸मंत्रोच्चार के साथ 'स्वाहा' बोलकर आहुति।
श्रौत अग्निहोत्र बनाम गृह्य अग्निहोत्र
- ▸श्रौत: अत्यन्त विस्तृत, तीन अग्नियों (गार्हपत्य, आहवनीय, दक्षिणाग्नि) में। एक ऋत्विज् आवश्यक।
- ▸गृह्य/दैनिक हवन: सरल रूप, एक हवनकुण्ड, गृहस्थ स्वयं कर सकता है।
आर्य समाज परम्परा
स्वामी दयानन्द सरस्वती ने अग्निहोत्र को दैनिक कर्तव्य बताया और सरल विधि प्रचलित की — प्रातः और सायं गायत्री मंत्र सहित हवन।



