विस्तृत उत्तर
सामवेद यज्ञ में गान (संगीतात्मक पाठ) के लिए प्रयुक्त होने वाला वेद है। यज्ञ के सन्दर्भ में इसका विशिष्ट और अपरिहार्य स्थान है।
सामवेद का विशेष महत्व
1गान प्रधान वेद
सामवेद की ऋचाएँ (जो अधिकांशतः ऋग्वेद से ली गई हैं) विशिष्ट सुर-ताल में गाई जाती हैं। 'साम' का अर्थ ही 'गान' है। भगवद्गीता (10.22) में श्रीकृष्ण कहते हैं — 'वेदानां सामवेदोऽस्मि' (वेदों में मैं सामवेद हूँ)।
2यज्ञ में उद्गाता की भूमिका
सोमयाग जैसे बड़े यज्ञों में 16 ऋत्विजों में से 4 सामवेदी होते हैं — उद्गाता (प्रमुख गायक), प्रस्तोता, प्रतिहर्ता, और सुब्रह्मण्य। उद्गाता सोमरस निकालते समय और विभिन्न सवनों (प्रातःसवन, माध्यन्दिन सवन, सायंसवन) में सामगान करता है।
3सप्तस्वर का उद्गम
भारतीय संगीत के सात स्वर (षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पञ्चम, धैवत, निषाद) सामवेद से ही उद्भूत माने जाते हैं।
4यज्ञ में देवताओं का आह्वान
सामगान का उद्देश्य यज्ञ के देवताओं (इन्द्र, अग्नि, सोम आदि) को प्रसन्न करना और उनका यज्ञ में आह्वान करना है। मान्यता है कि स्वरबद्ध गान से देवता विशेष रूप से आकृष्ट होते हैं।
5छान्दोग्य उपनिषद् में
सामगान को ब्रह्मविद्या का माध्यम बताया गया है। 'उद्गीथ' (ॐकार) को सामवेद का सार कहा गया है।
6सोमयाग में अनिवार्यता
बिना सामगान के सोमयाग अपूर्ण माना जाता है। सामवेदी ऋत्विजों के बिना बड़े श्रौत यज्ञ सम्पन्न नहीं हो सकते।





