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विस्तृत उत्तर
मृत्यु के समय से लेकर सपिण्डीकरण पूर्ण होने तक घर और परिजनों में अशौच या सूतक माना जाता है। इसे अशुद्धि की अवस्था कहा गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार यह अशुद्धि मुख्य रूप से दस दिनों तक रहती है, जब तक कि प्रेत का नया शरीर पूर्ण नहीं हो जाता। जैसे ही मृतक के हाथ में अंतिम पिण्ड रखा जाता है, आत्मा प्रेत की संज्ञा प्राप्त करती है और यह प्रेतत्व सपिण्डीकरण तक चलता है।
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