विस्तृत उत्तर
बच्चे की मृत्यु पर श्राद्ध एक विशेष कोटि का श्राद्ध है, जिसके लिए शास्त्रों ने अलग तिथियाँ निर्धारित की हैं। शास्त्रीय आधार के अनुसार अविवाहित या बाल्यावस्था में मृत बच्चों के लिए शास्त्रों में पंचमी (भरणी पंचमी) या त्रयोदशी तिथि निर्धारित की गई है। अर्थात् इन बच्चों का श्राद्ध दो विकल्प तिथियों पर किया जा सकता है, पहली पंचमी जिसे विशेष नाम भरणी पंचमी से जाना जाता है, और दूसरी त्रयोदशी।
यह श्राद्ध दो प्रकार के मृतकों के लिए है। पहले वे बच्चे जो विवाह से पहले मृत्यु को प्राप्त हुए, अर्थात् कोई भी अविवाहित मृतक। दूसरे वे जिनकी मृत्यु बचपन में ही हो गई, शिशु से लेकर बाल्यावस्था तक के सभी बच्चे। ये दोनों कोटियाँ सामान्य पितरों से भिन्न हैं और इनके लिए विशेष तिथि निर्धारित की गई है। शास्त्रों ने पंचमी और त्रयोदशी दोनों को विकल्प के रूप में दिया है, और कुलाचार तथा देशाचार के अनुसार इनमें से किसी एक का चयन किया जा सकता है।
इस विशेष व्यवस्था का शास्त्रीय आधार धर्मशास्त्रों में स्पष्ट रूप से वर्णित है। धर्मशास्त्रों, विशेषकर याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति और विभिन्न पुराणों में अकाल मृत्यु या अन्य विशेष अवस्थाओं के लिए पृथक तिथियों का कड़ा निर्देश है। बाल्यावस्था या अविवाहित मृत्यु एक अधूरी जीवन यात्रा है, जिसमें आत्मा को विशेष शांति की आवश्यकता होती है। इसी कारण शास्त्रों ने इन्हें विशेष तिथि देकर सम्मान दिया है। एक विद्वान श्राद्धकर्ता के लिए इन भेदों को जानना अनिवार्य है, अन्यथा श्राद्ध का फल विपरीत हो सकता है। निष्कर्षतः अविवाहित या बाल्यावस्था में मृत बच्चों का श्राद्ध शास्त्रों के अनुसार पंचमी (भरणी पंचमी) या त्रयोदशी तिथि को किया जाता है।
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