विस्तृत उत्तर
मृत्यु तिथि याद न होने पर श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या तिथि पर निर्धारित है। शास्त्रीय आधार के अनुसार जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि पूर्णतः विस्मृत हो चुकी हो, उनका श्राद्ध महालया अमावस्या को किया जाता है। इस तिथि के दो प्रचलित नाम हैं, पहला सर्वपितृ अमावस्या, जिसमें सर्व का अर्थ सभी, पितृ का अर्थ पितर, और अमावस्या का अर्थ कृष्ण पक्ष की अंतिम तिथि है, अर्थात् सभी पितरों की अमावस्या। दूसरा नाम महालया अमावस्या है, जिसमें महालय पितृ पक्ष का दूसरा नाम है, इसलिए इसे महालय की अमावस्या कहा जाता है।
यह तिथि आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अमावस्या होती है, जो पितृ पक्ष का अंतिम दिन है। यह श्राद्ध उन पितरों के लिए किया जाता है जिनकी मृत्यु तिथि पूर्णतः विस्मृत हो चुकी हो, अर्थात् याद नहीं रही और परिवार में उनकी कोई जानकारी नहीं है। ऐसे सभी विस्मृत पितरों का सम्मिलित श्राद्ध इसी दिन होता है।
इस तिथि का विशेष महत्व है। यह पितृ पक्ष की समाप्ति का दिन है, अर्थात् 16 दिनों की समाप्ति और सभी पितरों को विदा करने का दिन। यह उन सभी पितरों के लिए है जिनकी तिथि याद नहीं, और सम्मिलित श्राद्ध का यह विशेष अवसर है। अमावस्या स्वयं अत्यंत पवित्र तिथि मानी जाती है, और यह पितरों के लिए सर्वोच्च तिथि है।
यह तिथि इसलिए निर्धारित की गई ताकि सनातन धर्म में कोई पितर श्राद्ध से वंचित न रहे। तिथि याद न होने पर भी एक निश्चित दिन का प्रावधान है, और सर्वपितृ अमावस्या वह सुनिश्चित दिन है। श्राद्धकर्ता के लिए यह सरलता प्रदान करती है, क्योंकि तिथि याद रखने की चिंता नहीं रहती और एक विशेष दिन सबके लिए नियत है। आधुनिक समय में अधिकतर लोगों को पूर्वजों की मृत्यु तिथि याद नहीं होती, इसलिए यह तिथि उन सबके लिए सहारा है। निष्कर्षतः जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि पूर्णतः विस्मृत हो चुकी हो, उनका श्राद्ध सर्वपितृ अमावस्या या महालया अमावस्या को किया जाता है, और यह पितृ पक्ष का अंतिम तथा सबसे पवित्र दिन है।
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