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संन्यासी का श्राद्ध किस तिथि को करें?

**संन्यासी का श्राद्ध** = एक विशेष तिथि पर निर्धारित।

संक्षिप्त उत्तर

संन्यासी (यति) का श्राद्ध — जिन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया था और सांसारिक बंधनों से मुक्त थे — पितृ पक्ष की 'द्वादशी' तिथि को किया जाता है। यह उनकी विशिष्ट आध्यात्मिक कोटि के लिए शास्त्र-निर्धारित विशेष तिथि है।

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विस्तृत उत्तर

संन्यासी का श्राद्ध = एक विशेष तिथि पर निर्धारित।

### स्पष्ट उत्तर:

संन्यासी का श्राद्ध 'द्वादशी' तिथि को किया जाता है।

### शास्त्रीय आधार:

जिन महापुरुषों ने संन्यास ग्रहण कर लिया था और सांसारिक बंधनों से मुक्त थे, उनका श्राद्ध द्वादशी तिथि को किया जाता है।

### कौन हैं संन्यासी:

मूल परिभाषा

  • ▸जिन महापुरुषों ने संन्यास ग्रहण कर लिया था।
  • ▸सांसारिक बंधनों से मुक्त थे।

विशेषताएँ

  • ▸गृहस्थ जीवन त्यागकर संन्यास।
  • ▸सांसारिक मोह-माया से दूर।
  • ▸आध्यात्मिक साधना में लीन।

### तिथि:

  • ▸पितृ पक्ष की द्वादशी।
  • ▸आश्विन कृष्ण द्वादशी।

### दूसरा नाम:

  • ▸'यति' = संन्यासी का पर्याय।

### विशिष्ट कोटि:

  • ▸संन्यासी = एक विशेष आध्यात्मिक कोटि।
  • ▸सामान्य पितरों से भिन्न।
  • ▸इसलिए तिथि भी विशिष्ट।

### क्यों द्वादशी:

  • ▸संन्यासी = सांसारिक बंधनों से मुक्त।
  • ▸उनकी आत्मा पहले से ही उच्च आध्यात्मिक स्तर पर।
  • ▸उनके लिए विशेष पवित्र तिथि = द्वादशी।

### सम्पूर्ण मृत्यु प्रकार और तिथियाँ:

  • ▸स्वाभाविक मृत्यु प्रतिपदा को → प्रतिपदा
  • ▸अकाल मृत्यु → चतुर्दशी
  • ▸सुहागिन स्त्री → नवमी (अविधवा / मातृ नवमी)
  • ▸संन्यासी / यति → द्वादशी ← यहाँ
  • ▸बच्चे → पंचमी / त्रयोदशी
  • ▸अज्ञात तिथि → सर्वपितृ अमावस्या

### शास्त्रीय आधार:

धर्मशास्त्रों, विशेषकर याज्ञवल्क्य स्मृति, पराशर स्मृति और विभिन्न पुराणों में अकाल मृत्यु या अन्य विशेष अवस्थाओं के लिए पृथक तिथियों का कड़ा निर्देश है।

### महत्वपूर्ण बिंदु:

1केवल संन्यासियों के लिए

  • ▸सामान्य गृहस्थों के लिए यह तिथि नहीं।
  • ▸केवल वे जो विधिवत संन्यास ग्रहण कर चुके।

2विशेष सम्मान

  • ▸संन्यासी = सम्माननीय आध्यात्मिक कोटि।
  • ▸अलग तिथि = इसी सम्मान का प्रतीक।

3यति का पर्याय

  • ▸'यति' और 'संन्यासी' = समानार्थी।
  • ▸दोनों के लिए द्वादशी तिथि।

### श्राद्धकर्ता का कर्तव्य:

एक विद्वान श्राद्धकर्ता के लिए इन भेदों को जानना अनिवार्य है, अन्यथा श्राद्ध का फल विपरीत हो सकता है।

### महत्व:

यह सिद्ध करता है कि सनातन धर्म में जीवन के विभिन्न आश्रमों (गृहस्थ, संन्यास) के अनुसार श्राद्ध की अलग व्यवस्था है।

### निष्कर्ष:

संन्यासी (यति) — जिन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया था और सांसारिक बंधनों से मुक्त थे — का श्राद्ध 'द्वादशी' तिथि को किया जाता है।

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