विस्तृत उत्तर
एकादशी व्रत तोड़ने की क्रिया को 'पारण' कहते हैं। शास्त्रों के अनुसार पारण सदैव द्वादशी तिथि में करना चाहिए — एकादशी के अगले दिन।
पारण का सही समय इस प्रकार निर्धारित होता है: द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद पारण करें। इससे पहले 'हरिवासर' का समय होता है, जो द्वादशी तिथि का पहला एक-चौथाई भाग है — इस समय पारण नहीं करना चाहिए। हरिवासर समाप्त होने के बाद ही व्रत खोलें।
यदि किसी कारण से प्रातःकाल पारण न हो सके तो मध्याह्न के बाद भी पारण किया जा सकता है। परंतु सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि त्रयोदशी तिथि आने से पहले पारण अवश्य कर लें — यानी द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले व्रत खोलना जरूरी है। यदि द्वादशी तिथि सूर्योदय से पहले ही समाप्त हो गई हो तो उस दिन सूर्योदय के बाद जितनी जल्दी हो सके पारण कर लें।
पारण की विधि में पहले भगवान विष्णु की पूजा करें, तुलसी पत्र और चरणामृत ग्रहण करें, फिर सात्विक भोजन से व्रत खोलें। द्वादशी के दिन ब्राह्मणों और जरूरतमंदों को भोजन या दान देना भी शुभ माना गया है।
