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व्रत एवं उपवास⏱ 2 मिनट पठन

प्रदोष व्रत विधि और समय?

प्रदोष व्रत त्रयोदशी को रखा जाता है।

संक्षिप्त उत्तर

प्रदोष व्रत त्रयोदशी को रखा जाता है। पूजा का समय — सूर्यास्त से ४५ मिनट पहले से ४५ मिनट बाद (प्रदोष काल) — सबसे शुभ है। स्नान, उपवास, शिवलिंग पूजा, बेलपत्र, जल अभिषेक और कथा श्रवण इसके मुख्य अंग हैं।

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विस्तृत उत्तर

प्रदोष व्रत प्रत्येक माह की शुक्ल और कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। इसलिए एक माह में दो और वर्ष में २४ से २५ प्रदोष व्रत होते हैं। इसे त्रयोदशी व्रत भी कहते हैं। इस व्रत का नाम 'प्रदोष' इसलिए पड़ा क्योंकि इस दिन पूजा प्रदोष काल में की जाती है।

प्रदोष काल का समय — सूर्यास्त से ४५ मिनट पहले से सूर्यास्त के ४५ मिनट बाद तक का समय प्रदोष काल कहलाता है। यही समय भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे शुभ माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार इसी समय महादेव कैलाश पर्वत पर आनंदमय नृत्य करते हैं और देवगण उनकी स्तुति करते हैं।

व्रत की विधि इस प्रकार है:

प्रातःकाल स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और व्रत का संकल्प लें।

पूरे दिन अन्न ग्रहण न करें। फलाहार या निर्जल व्रत रखें।

प्रदोष काल में पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा की ओर मुख करके भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की पूजा करें।

शिवलिंग पर जल, दूध, बेलपत्र, गंध, पुष्प अर्पित करें। 'ॐ नमः शिवाय' का जाप करें।

रुद्राभिषेक करना अति फलदायी माना जाता है।

प्रदोष की कथा सुनें और आरती करें।

संकल्प के अनुसार ११ या २६ प्रदोष व्रत रखने के बाद उद्यापन करना चाहिए। वार के अनुसार व्रत का विशेष महत्व होता है — सोम प्रदोष रोग निवारण, भौम प्रदोष शत्रु नाश और शनि प्रदोष मोक्ष के लिए विशेष फलदायी माना जाता है।

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