विस्तृत उत्तर
सफला एकादशी पौष माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को आती है और भगवान विष्णु को समर्पित है। इसके देवता श्रीनारायण हैं। 'सफला' नाम ही इसके महत्व को प्रकट करता है — अर्थात् सभी कार्यों को सफल करने वाली एकादशी।
पद्मपुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण में सफला एकादशी की महिमा विस्तार से वर्णित है। भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया था कि बड़े-बड़े यज्ञों और दान से जो फल प्राप्त होता है, वह इस एकादशी के व्रत से भी प्राप्त किया जा सकता है।
इस एकादशी की प्रसिद्ध कथा राजा महिष्मान के पुत्र लुम्पक की है, जो पापाचारी होने के कारण वन में भटक रहा था। पौष कृष्ण दशमी की कड़ाके की ठंड में वह पीपल वृक्ष के नीचे रात भर जागता रहा। अगले दिन एकादशी को उसने जंगल से फल उठाए और पीपल के वृक्ष को अर्पित करते हुए कहा — 'ये फल भगवान विष्णु को समर्पित हैं।' अनजाने में ही उसका व्रत और जागरण पूरा हो गया। भगवान विष्णु उसकी निर्बल भक्ति से प्रसन्न हुए और उसे राज्य और समृद्धि का वरदान दिया।
इस व्रत को करने से पूर्वजन्म के पापों का नाश होता है, रुके हुए कार्य पूरे होते हैं, जीवन में सुख-समृद्धि और सफलता आती है। पाँच हजार वर्षों की तपस्या से जो पुण्य मिलता है, वह इस व्रत के रात्रि जागरण से प्राप्त हो जाता है।




