सफला एकादशी व्रत-कथा: पद्म पुराण अंतर्गत युधिष्ठिर-श्रीकृष्ण संवाद का अक्षुण्ण एवं पारंपरिक प्रस्तुतीकरण
पारंपरिक प्रारंभ: युधिष्ठिर द्वारा प्रश्न
द्वापर युग के पावन काल में, जब धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से एकादशी व्रतों के गूढ़ माहात्म्य और उनके विधान के विषय में जिज्ञासा प्रकट की, तब यह पारंपरिक संवाद आरंभ हुआ । धर्मराज युधिष्ठिर ने परम श्रद्धा और भक्तिभाव से कमलनयन भगवान वासुदेव को प्रणाम करते हुए पूछा, "हे देवदेवेश्वर! हे जगत्पति वासुदेव! मैं आपके श्रीचरणों में बारंबार नमस्कार करता हूँ । हे प्रभो! कृपा करके मुझे यह बताने का कष्ट करें कि पौष मास (गुजरात और महाराष्ट्र के पंचांग के अनुसार मार्गशीर्ष मास) के कृष्ण पक्ष में जो एकादशी तिथि आती है, उसका क्या नाम है? उस परम पावन एकादशी के पीठासीन देवता कौन हैं और उस दिन किस विधि से व्रत तथा भगवान का पूजन किया जाना चाहिए? हे मधुसूदन! मुझ पर कृपा करके इस एकादशी का संपूर्ण माहात्म्य और उसकी पारंपरिक कथा विस्तारपूर्वक यथार्थ रूप में कहिए।"
श्रीकृष्ण द्वारा सफला एकादशी का माहात्म्य-वर्णन
धर्मराज युधिष्ठिर के इस धर्मयुक्त और विनीत प्रश्न को सुनकर, तीनों लोकों के स्वामी भगवान श्रीकृष्ण ने अत्यंत प्रसन्न होकर उत्तर दिया, "हे नृपश्रेष्ठ युधिष्ठिर! मैं तुम्हारे स्नेह और भक्तिभाव के कारण इस उत्तम व्रत का माहात्म्य और कथा तुम्हें विस्तारपूर्वक सुनाता हूँ । तुम ध्यानपूर्वक श्रवण करो। पौष मास के कृष्ण पक्ष में जो महान पुण्यमयी एकादशी आती है, उसका नाम 'सफला' एकादशी है । जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह एकादशी जीवन के सभी कार्यों में सफलता प्रदान करने वाली और अंत में उत्तम गति देने वाली है ।
इस सफला एकादशी के अधिष्ठाता देवता स्वयं भगवान नारायण (श्रीहरि) हैं । हे राजन्! जिस प्रकार नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़, ग्रहों में चंद्रमा, यज्ञों में अश्वमेध और देवताओं में स्वयं भगवान विष्णु श्रेष्ठ हैं, ठीक उसी प्रकार सभी प्रकार के व्रतों और तपस्याओं में एकादशी का व्रत सबसे उत्तम और परम श्रेष्ठ है । हे युधिष्ठिर! मुझे बड़े-बड़े यज्ञों, अनुष्ठानों और प्रचुर दक्षिणा वाले कर्मकांडों से भी उतना संतोष और प्रसन्नता प्राप्त नहीं होती, जितनी प्रसन्नता मुझे एकादशी व्रत के निष्ठापूर्वक अनुष्ठान से प्राप्त होती है ।
इस एकादशी के दिन विधिपूर्वक मेरे नाम मंत्रों का उच्चारण करते हुए भगवान श्रीहरि का पूजन करना चाहिए । सफला एकादशी के दिन भगवान को विशेष रूप से फलों का नैवेद्य अर्पित किया जाता है ।
| क्रमांक | सफला एकादशी पूजन हेतु शास्त्रोक्त फल एवं सामग्रियाँ |
|---|---|
| 1 | नारियल का फल |
| 2 | सुपारी |
| 3 | बिजौरा नींबू |
| 4 | जमीरा नींबू |
| 5 | अनार |
| 6 | सुंदर आँवला |
| 7 | लौंग |
| 8 | बेर |
| 9 | आम के फल (विशेष रूप से) |
| 10 | धूप और दीप |
इन उत्तम फलों, धूप और दीप से देवदेवेश्वर श्रीहरि की अर्चना करनी चाहिए । सफला एकादशी की रात्रि में 'दीप दान' करने का विशेष और अत्यंत पुण्यदायी विधान शास्त्रों में बताया गया है । रात्रि के समय वैष्णव पुरुषों और भक्तों के साथ मिलकर भगवान के समीप जागरण करना चाहिए । एकादशी की रात्रि में जागरण करने वाले भक्त को जो अपार फल मिलता है, वह हजारों वर्ष की कठोर तपस्या से भी प्राप्त नहीं हो सकता ।
हे धर्मराज! अब मैं तुम्हें इस सफला एकादशी व्रत की वह परम पावन और अद्भुत कथा सुनाता हूँ, जिसके केवल श्रवण मात्र से मनुष्य के कोटि-कोटि जन्मों के पाप भस्म हो जाते हैं।"
मुख्य कथा: चम्पावती नगरी और राजा महिष्मान का परिचय
भगवान श्रीकृष्ण ने कथा का आरंभ करते हुए कहा, "हे युधिष्ठिर! प्राचीन काल में चम्पावती नाम की एक अत्यंत सुंदर, विशाल और धन-धान्य से परिपूर्ण नगरी थी (कुछ पुराणों में इस नगरी को माहिष्मती भी कहा गया है) । उस सुरम्य नगरी में महिष्मान नाम के एक अत्यंत प्रतापी, धर्मनिष्ठ और सत्यवादी राजा राज्य करते थे । राजा महिष्मान अपनी प्रजा का पालन अपनी संतान के समान करते थे। उनके राज्य में सर्वत्र धर्म का आचरण होता था और प्रजा अत्यंत सुखी तथा संपन्न थी। राजा महिष्मान के कुल पाँच पुत्र थे । राजा अपने सभी पुत्रों से अत्यंत स्नेह करते थे और उन्हें धर्म तथा शास्त्र की शिक्षा प्रदान करते थे।"
लुम्पक नामक पुत्र का दुराचार और प्रजा को कष्ट
"हे राजन्! राजा महिष्मान के पाँच पुत्रों में जो उनका सबसे बड़ा (ज्येष्ठ) पुत्र था, उसका नाम लुम्पक (अथवा लुम्भक) था । यद्यपि वह एक महान और धर्मनिष्ठ राजा का ज्येष्ठ पुत्र था, तथापि उसका स्वभाव अत्यंत विपरीत था। लुम्पक अत्यंत दुराचारी, चरित्रहीन और पापी स्वभाव का था । वह राजपुत्र होने के मर्यादा-पथ से पूर्णतः भटक चुका था और सदा अधर्म के कार्यों में ही लिप्त रहता था。
लुम्पक के भीतर अनेक भयंकर दोष घर कर गए थे। वह वेश्यागमन करता, जुआ खेलता और चोरी जैसे घोर कुकर्मों में फँसा हुआ था । वह सदैव देवताओं, ब्राह्मणों और वैष्णवों की घोर निंदा करता था । सात्विक भोजन का त्याग करके वह सदा मांस-भक्षण आदि निंदनीय कार्यों में तत्पर रहता था । उसने अपने पिता राजा महिष्मान से प्राप्त हुए अपार धन को इन्ही दुर्व्यसनों और कुकर्मों में नष्ट करना आरंभ कर दिया था । लुम्पक के इस चरित्रहीन, पापमय और अत्याचारी आचरण के कारण चम्पावती नगरी की संपूर्ण प्रजा अत्यंत दुखी, भयभीत और त्रस्त रहने लगी थी । प्रजा अपने ही राजकुमार के कुकृत्यों से त्राहि-त्राहि कर रही थी।"
पिता द्वारा राज्य से निष्कासन
"जब प्रजा का कष्ट अत्यंत बढ़ गया, तब राजा महिष्मान को अपने ज्येष्ठ पुत्र लुम्पक के इन भयंकर दुराचारों और घोर पाप-कर्मों का पूर्ण रूप से ज्ञान हुआ । एक धर्मनिष्ठ राजा के रूप में महिष्मान अत्यंत कुपित और हृदय से दुखी हुए। उन्होंने विचार किया कि जो पुत्र प्रजा का कंटक हो और धर्म की मर्यादा को नष्ट कर रहा हो, उसे राजमहल में आश्रय देना राजधर्म के विरुद्ध है। अतः, प्रजा के व्यापक हित और धर्म की रक्षा के लिए राजा महिष्मान ने कठोर निर्णय लेते हुए अपने ही ज्येष्ठ पुत्र लुम्पक को अपने राज्य चम्पावती से निर्वासित (बाहर निकाल) कर दिया । पिता द्वारा इस प्रकार बहिष्कृत कर दिए जाने पर लुम्पक राज्य की सीमाओं को छोड़कर चला गया।"
वन में जीवन, चोरी और पापमय आचरण
"राज्य से निकाले जाने के पश्चात लुम्पक एक अत्यंत भयंकर और घने जंगल में जाकर निवास करने लगा । परंतु वन में जाकर भी उस दुराचारी के पापकर्म शांत नहीं हुए। उसने धर्म का मार्ग नहीं अपनाया, अपितु वह दिन में जंगल के निर्दोष जीवों को मारता और मांस-भक्षण करता था । जैसे ही रात्रि का अंधकार छाता, वह अपने ही पिता की नगरी चम्पावती में छिपकर प्रवेश करता और नगरवासियों के घरों में चोरी और लूटपाट करता था । वह इतना निर्लज्ज हो गया था कि वह अपने ही राज्य में तस्करों के समान व्यवहार करने लगा。
कई बार उस नगरी के रात्रि-रक्षकों (पहरेदारों) ने उसे चोरी करते हुए रंगे हाथों पकड़ भी लिया, परंतु जब वे देखते कि यह तो राजा महिष्मान का ज्येष्ठ पुत्र है, तो राजकुमार जानकर वे उसे भयवश छोड़ देते थे । इस प्रकार वह पापी चोरी और हिंसा के बल पर अपना जीवन निर्वाह कर रहा था। उस विशाल वन में एक अत्यंत प्राचीन और विशाल पीपल का वृक्ष था। वह पीपल का वृक्ष भगवान विष्णु का अत्यंत प्रिय माना जाता था और उस वन में उसे साक्षात् देवता के समान पूजनीय माना जाता था । महापापी लुम्पक ने उसी पवित्र पीपल के वृक्ष के नीचे अपना विश्राम स्थल बना लिया और वहीं रहकर वह अपना पापमय जीवन व्यतीत करने लगा । वह प्रतिदिन उसी वृक्ष के नीचे मांस और कंद-मूल खाता था।"
एकादशी की रात्रि का प्रसंग: अनजाने में उपवास एवं जागरण
"हे युधिष्ठिर! यद्यपि लुम्पक एक महापापी था, तथापि उसके पूर्व जन्म के किसी संचित पुण्य के प्रभाव से अथवा भगवान की अहैतुकी कृपा से एक बार अनायास ही उससे सफला एकादशी के परम उत्तम और पुण्यदायी व्रत का पालन हो गया । यह घटना इस प्रकार घटित हुई कि पौष मास के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि का दिन आया । उस दिन वन में अत्यधिक और कड़ाके की ठंड पड़ रही थी ।
लुम्पक के पास शीत के भयंकर प्रकोप से बचने के लिए शरीर पर पर्याप्त वस्त्र नहीं थे। वस्त्रहीन अवस्था में होने के कारण वह रात भर उस भयंकर ठंड से बुरी तरह ठिठुरता और कांपता रहा । शीत के उस निर्मम प्रहार के कारण उसे दशमी की रात्रि में तनिक भी निद्रा नहीं आई। वह लगभग मृतप्राय (बेहोश) अवस्था में उसी भूमि पर पड़ा रहा और उसे न तो कोई विश्राम मिला, न ही चैन । इस प्रकार शीत के कष्ट के कारण अनजाने में ही दशमी की वह पूरी महानिशा उसके जागरण और कष्ट में व्यतीत हो गई।"
"अगले दिन, अर्थात् पौष कृष्ण पक्ष की सफला एकादशी का पवित्र सूर्योदय हुआ। परंतु ठंड के भयंकर प्रभाव और शारीरिक दुर्बलता के कारण पापी लुम्पक एकादशी के दिन दोपहर तक मूर्छित और अचेत अवस्था में ही पृथ्वी पर पड़ा रहा । एकादशी के दिन दोपहर होने पर जब आकाश में सूर्य देव कुछ ऊपर आए और उनकी किरणों से लुम्पक के जमे हुए शरीर को कुछ गर्मी प्राप्त हुई, तब जाकर उसे धीरे-धीरे होश आया । वह उस पीपल के वृक्ष के नीचे से बड़ी कठिनाई से उठा। होश में आने पर उसे अत्यंत भयंकर भूख और प्यास सताने लगी。
भूख से व्याकुल होकर वह भोजन की खोज में लड़खड़ाता हुआ वन में भटकने लगा। एकादशी के उस पावन दिन अत्यधिक दुर्बलता के कारण वह किसी भी जीव का शिकार करने या उसे मारने में पूर्णतः असमर्थ था । इसलिए वह अपने प्राणों की रक्षा हेतु केवल वन में वृक्षों से गिरे हुए कुछ जंगली फल ही एकत्रित कर सका । उन फलों को लेकर जब तक वह लड़खड़ाते कदमों से वापस उस पीपल के वृक्ष के नीचे अपने स्थान पर लौटा, तब तक भगवान सूर्य अस्ताचल को जा चुके थे (सूर्यास्त हो चुका था) ।"
"अपने दुर्दिन, कष्टों और भूख से अत्यंत निराश होकर उसने वे एकत्रित किए हुए फल उस पवित्र पीपल के वृक्ष की जड़ में रख दिए । शारीरिक पीड़ा और ज्वर के कारण उसे वे फल खाने की इच्छा भी नहीं हो रही थी। तब उसके मुख से अनायास ही एक आर्त और पश्चाताप भरा वाक्य निकला। उसने फलों को वृक्ष की जड़ में अर्पित करते हुए कहा, 'हे प्रभो! मैं किस कर्म की सजा भोग रहा हूँ। मैं इन फलों को खाने में असमर्थ हूँ। इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान विष्णु संतुष्ट हों और वही इन्हें स्वीकार कर इसका भोग लगाएँ।' । ऐसा कहकर उसने वे फल भगवान को समर्पित कर दिए。
रात्रि होने पर भूख, भयंकर शीत और शारीरिक पीड़ा के कारण लुम्पक को पुनः निद्रा नहीं आई । वह अपनी दयनीय स्थिति पर पूरी रात रोता रहा और कष्ट में जागरण करता रहा । इस प्रकार हे धर्मराज! उस महापापी लुम्पक से अनजाने में ही, बिना किसी संकल्प के, पौष कृष्ण एकादशी का वह निराहार उपवास और संपूर्ण रात्रि का जागरण संपन्न हो गया । उसने कोई अन्न ग्रहण नहीं किया और रात्रि भर जागता रहा।"
प्रातः भगवान की कृपा और पाप-नाश
"हे युधिष्ठिर! उस पापी द्वारा अनजाने में ही सही, परंतु पूर्ण रूप से किए गए सफला एकादशी के इस निराहार उपवास और रात्रि-जागरण से भगवान श्रीहरि (नारायण) अत्यंत प्रसन्न हुए । एकादशी व्रत का प्रभाव इतना अमोघ है कि द्वादशी के दिन प्रातःकाल होते ही भगवान की असीम कृपा से उस निर्जन वन में एक अत्यंत अद्भुत और अलौकिक घटना घटी। अनजाने में किए गए इस श्रेष्ठ व्रत के प्रभाव से लुम्पक के जीवन भर के और जन्म-जन्मांतर के सभी संचित पाप उसी क्षण नष्ट हो गए ।
सुबह का प्रकाश होते ही लुम्पक के समक्ष अनेक प्रकार की सुंदर वस्तुओं और दिव्य आभूषणों से सजा हुआ एक अलौकिक और दिव्य रथ आकाश मार्ग से उतरकर आ खड़ा हुआ । उसी समय वन में एक अत्यंत मधुर और गंभीर आकाशवाणी (देववाणी) हुई। आकाशवाणी ने लुम्पक को संबोधित करते हुए कहा, 'हे राजकुमार! भगवान नारायण के प्रभाव और तुम्हारे द्वारा किए गए सफला एकादशी के इस उत्तम व्रत के प्रताप से तुम्हारे सभी पाप पूरी तरह नष्ट हो गए हैं । अब तुम शीघ्र ही अपने पिता के पास जाओ और अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त कर निर्बाध रूप से राजपाट संभालो।' ।"
पिता द्वारा पुनः राज्य-प्राप्ति एवं धर्ममय शासन
"उस दिव्य आकाशवाणी को सुनकर लुम्पक अत्यंत आश्चर्यचकित और प्रसन्न हुआ। उसने भगवान विष्णु के इस असीम अनुग्रह को समझकर उन्हें साष्टांग प्रणाम किया और इस महान पुण्य के फल को सहर्ष स्वीकार किया । आकाशवाणी के समाप्त होते ही, भगवान श्रीहरि की कृपा से लुम्पक का मलिन और दुर्बल शरीर तत्काल एक अत्यंत सुंदर और दिव्य रूप में परिवर्तित हो गया । उसे सुंदर राजसी वस्त्र और दिव्य आभूषण प्राप्त हुए। सबसे बड़ा चमत्कार यह हुआ कि उसकी दूषित और पापी बुद्धि शुद्ध हो गई और अब उसकी वह उत्तम बुद्धि पूरी तरह से भगवान विष्णु के भजन, स्मरण और धर्म के मार्ग में लग गई ।
उस दिव्य रथ पर सवार होकर, श्रेष्ठ आभूषणों से संपन्न लुम्पक अपने पिता राजा महिष्मान के पास चम्पावती नगरी की ओर लौटा । राजमहल में पहुँचकर उसने अपने पिता के चरणों में गिरकर अपने पूर्वकृत सभी अपराधों के लिए क्षमा माँगी और वन में अपने साथ घटी सफला एकादशी की वह संपूर्ण अलौकिक कथा उन्हें विस्तार से सुनाई । अपने पुत्र के रूप, आचरण और विचारों में हुए इस अलौकिक परिवर्तन को देखकर और उसे भगवान का परम भक्त बना हुआ जानकर, राजा महिष्मान का हृदय गदगद हो गया और वे अत्यंत प्रसन्न हुए । उन्होंने लुम्पक को हृदय से लगा लिया और बिना किसी विलंब के अपना संपूर्ण राज्य और राजसिंहासन लुम्पक को सौंप दिया ।
| विषय | सफला एकादशी के प्रभाव से पूर्व की स्थिति | सफला एकादशी व्रत के प्रभाव के पश्चात की स्थिति |
|---|---|---|
| चरित्र | वेश्यागमन, जुआ, चोरी, देवताओं की निंदा | भगवान श्रीहरि का परम भक्त, धर्मनिष्ठ शासक |
| बुद्धि | दूषित, हिंसक और पापमय | शुद्ध, सात्विक और विष्णु-भजन में लीन |
| शारीरिक अवस्था | वस्त्रहीन, दुर्बल, शीत से पीड़ित | दिव्य रूप, सुंदर वस्त्र और अलौकिक आभूषणों से सुसज्जित |
| सामाजिक स्थिति | पिता द्वारा निष्कासित, वनवासी | पिता द्वारा क्षमादान, राज्य की पुनः प्राप्ति और राज्याभिषेक |
राजसिंहासन पर विराजमान होकर लुम्पक ने शास्त्र-मर्यादा के अनुसार अत्यंत धर्मपूर्वक और श्रद्धा से शासन करना आरंभ किया। सफला एकादशी के प्रभाव से वह पूरी श्रद्धा से प्रत्येक एकादशी का व्रत करने लगा । उसका पूरा परिवार, उसकी पत्नी और प्रजा सभी भगवान नारायण के परम भक्त बन गए । लुम्पक ने पूरे नगर में यह उद्घोषणा करवा दी कि उसके राज्य में रहने वाला हर स्त्री, पुरुष, बच्चा और बूढ़ा सभी एकादशी का व्रत नियमपूर्वक करेंगे । इस प्रकार लुम्पक ने पूरे पंद्रह वर्षों तक अकंटक और निर्बाध रूप से उस राज्य का संचालन किया । भगवान श्रीकृष्ण की विशेष कृपा से लुम्पक को 'मनोज्ञ' नामक एक अत्यंत सुंदर, आज्ञाकारी और गुणवान पुत्र की प्राप्ति हुई ।
अंततः उत्तम गति (मोक्ष की प्राप्ति)
हे युधिष्ठिर! समय व्यतीत होने पर जब लुम्पक का पुत्र मनोज्ञ युवा और राजकाज संभालने योग्य हो गया, तब लुम्पक के मन में वैराग्य उत्पन्न हो गया। उसने जान लिया था कि संसार के भौतिक सुख और पाप नाशवान हैं । अतः उसने राज्य की ममता का तुरंत परित्याग कर दिया और अपना संपूर्ण राजपाट अपने योग्य पुत्र मनोज्ञ को सौंप दिया ।
राज्य का सारा भार पुत्र को सौंपने के पश्चात, लुम्पक वन में चला गया और वहाँ जाकर वह भगवान श्रीकृष्ण के समीप, उनके भजन और कठोर तपस्या में पूर्णतः लीन हो गया । अपना शेष जीवन अगाध हरि-भक्ति और एकादशी व्रतों के पालन में व्यतीत करते हुए, अंत समय में जब उसने अपने भौतिक शरीर का त्याग किया, तो एकादशी मैया की कृपा से भगवान के दिव्य विमान में बैठकर वह भगवान विष्णु के परम धाम (विष्णु लोक अथवा वैकुंठ) को प्राप्त हुआ । वह भगवान के उस परम धाम में पहुँच गया, जहाँ जाने के पश्चात मनुष्य का पुनर्जन्म नहीं होता और वह कभी शोक के पाश में नहीं पड़ता ।
पारंपरिक फल-वचन (फलश्रुति)
सफला एकादशी की यह अद्भुत कथा पूर्ण करने के पश्चात भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर से अत्यंत गंभीर और कल्याणकारी वचनों में कहा, "हे राजन्! जो मनुष्य इस प्रकार परम श्रद्धा, प्रेम और नियमपूर्वक इस कल्याणमयी 'सफला एकादशी' का उत्तम व्रत करता है, वह इस लोक में समस्त प्रकार के सुखों का उपभोग करके मृत्यु के पश्चात निश्चित रूप से मोक्ष को प्राप्त होता है । इस संसार (धरती) में वे मनुष्य अत्यंत धन्य हैं, जो सफला एकादशी के व्रत में निरंतर लगे रहते हैं; निःसंदेह उन्हीं का जन्म सफल है ।
हे महाराज युधिष्ठिर! जो मनुष्य इस सफला एकादशी व्रत की इस महान माहात्म्य कथा को पढ़ता है, इसका श्रवण करता है अथवा इसके विधान के अनुसार आचरण करता है, उसके जीवन के सभी कार्य सफल हो जाते हैं और उसे राजसूय यज्ञ तथा अश्वमेध यज्ञ करने का महान फल सहज ही प्राप्त हो जाता है । इस परम उत्तम व्रत को यदि कोई अनजाने में भी पूर्ण कर लेता है (जैसे लुम्पक ने किया), तो वह भी पापों से मुक्त होकर मृत्यु के उपरांत बैकुंठ धाम को प्राप्त होता है । जो मनुष्य इस एकादशी का पालन नहीं करते, वे पूंछ और सींग से रहित पशु के समान अपना जीवन व्यर्थ गँवाते हैं । अतः मनुष्यों को अपने कल्याण, आत्मशुद्धि और श्रीहरि की प्रसन्नता के लिए सफला एकादशी का व्रत अनिवार्य रूप से करना चाहिए।"