विस्तृत उत्तर
निर्जला एकादशी ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को आती है और इसे वर्ष की सभी चौबीस एकादशियों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। मान्यता है कि केवल इस एक एकादशी का व्रत करने से वर्ष भर की सभी एकादशियों का फल मिल जाता है। इसे भीमसेनी एकादशी या पांडव एकादशी भी कहते हैं, क्योंकि महाभारत काल में महर्षि व्यास ने भीम को यही एकादशी करने की सलाह दी थी।
व्रत की विधि इस प्रकार है:
दशमी की रात्रि से ही मांस, प्याज, लहसुन और मसूर दाल का त्याग करें।
एकादशी के दिन ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ, पीले रंग के वस्त्र धारण करें।
संकल्प लें — इस व्रत में जल और अन्न दोनों का पूरी तरह त्याग किया जाता है। स्नान और आचमन के समय ही जल का उपयोग होता है।
भगवान विष्णु की मूर्ति या शालिग्राम को पंचामृत से स्नान कराएं। पीले फूल, पीले चंदन, तुलसी दल, पीले फल और मिठाई अर्पित करें।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करें और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें।
संध्याकाल में दीपदान करें और रात्रि जागरण करते हुए भजन-कीर्तन करें।
यथाशक्ति जल, पंखा, फल और अन्न का दान करें — गर्मी के मौसम में जल और जलपात्र के दान का विशेष महत्व है।
द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर और दान-दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें।
