विस्तृत उत्तर
निर्जला एकादशी (ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी) सभी एकादशियों में सबसे कठोर और सर्वाधिक पुण्यफल देने वाली एकादशी है। इसे 'भीमसेनी एकादशी' भी कहते हैं।
पौराणिक कथा: महाभारत के भीम को भोजन के बिना रहना असम्भव था, अतः वे 24 एकादशी व्रत नहीं रख पाते थे। व्यास जी ने उन्हें बताया कि यदि वर्ष में केवल एक बार ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को निर्जला (बिना जल) व्रत रखें तो 24 एकादशियों का सम्पूर्ण फल मिल जाएगा।
निर्जला एकादशी व्रत विधि
1दशमी (पूर्व दिन)
- ▸संध्या को सात्त्विक भोजन (अन्नयुक्त, किन्तु चावल से बचें)।
- ▸रात्रि में ब्रह्मचर्य। मानसिक तैयारी।
2एकादशी दिन — निर्जला व्रत
- ▸सूर्योदय से अगले दिन द्वादशी सूर्योदय तक — जल की एक बूँद भी नहीं पीनी।
- ▸भोजन, फल, दूध — कुछ भी वर्जित। केवल आचमन (मुख में जल लेकर थूकना, निगलना नहीं) कर सकते हैं।
- ▸प्रातःकाल स्नान → विष्णु पूजा → तुलसी अर्पण → 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' जप।
3विशेष पूजा
- ▸भगवान विष्णु की षोडशोपचार पूजा।
- ▸विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता, भागवत पाठ।
- ▸निर्जला एकादशी व्रत कथा का श्रवण/पाठ।
4. रात्रि जागरण: पूरी रात जागकर भजन-कीर्तन, कथा श्रवण।
4द्वादशी पारण
- ▸द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद पारण करें।
- ▸पहले जल पीएँ (तुलसी दल सहित), फिर सात्त्विक भोजन।
- ▸पारण का समय चूकना नहीं चाहिए — द्वादशी समाप्त होने से पहले अवश्य करें।
6. दान: निर्जला एकादशी पर जल से भरा घड़ा (जलदान), पंखा, छाता, जूते-चप्पल (ग्रीष्म ऋतु), फल, मिठाई, अन्न, वस्त्र दान अत्यंत पुण्यदायी। ब्राह्मण को भोजन और दक्षिणा।
फल: पद्म पुराण के अनुसार निर्जला एकादशी का व्रत करने से 24 एकादशियों का सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त होता है। यह एकमात्र ऐसा व्रत है जो वर्ष भर की सभी एकादशियों के बराबर फल देता है।
सावधानी: ज्येष्ठ मास में भीषण गर्मी होती है — निर्जला व्रत अत्यंत कठोर है। वृद्ध, रोगी, गर्भवती महिलाओं को अपनी क्षमता अनुसार ही व्रत रखना चाहिए। स्वास्थ्य से समझौता न करें।


