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निर्जला एकादशी व्रत कथा: ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की संपूर्ण पारंपरिक कथा

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निर्जला एकादशी व्रत कथा: पद्म पुराण, ब्रह्मवैवर्त पुराण एवं पारंपरिक ग्रंथों पर आधारित संपूर्ण प्रामाणिक पाठ

प्रथम अध्याय: पारंपरिक मंगलाचरण, संकल्प एवं कथा का आरंभ

सनातन धर्म की पौराणिक कथा-श्रवण परंपरा के अनुसार, किसी भी महात्म्य या व्रत कथा का वाचन आरंभ करने से पूर्व इष्टदेव, भगवान श्रीहरि विष्णु, परम तपस्वी महर्षि वेदव्यास एवं एकादशी माता का ध्यान किया जाता है। निर्जला एकादशी की पवित्र कथा का वाचन आरंभ करने से पूर्व जो पारंपरिक मंगलाचरण और ध्यान के श्लोक पढ़े जाते हैं, वे इस प्रकार हैं:

शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं,
विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।
लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं,
वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥


व्यासवाशिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम्।
पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम्॥


व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे।
नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः॥

पारंपरिक वाक्यों का सस्वर उच्चारण: "बोलिए श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की जय। बोलिए एकादशी माता की जय। श्री वेदव्यास जी महाराज की जय। धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो, प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो। आज के आनंद की जय हो। ॐ नमः पार्वती पते, हर हर महादेव।"


द्वितीय अध्याय: धर्मराज युधिष्ठिर एवं भगवान श्रीकृष्ण का संवाद

पद्म पुराण के उत्तर खण्ड तथा पारंपरिक एकादशी माहात्म्य ग्रंथों (विशेषकर गीता प्रेस, गोरखपुर द्वारा प्रकाशित प्रामाणिक संस्करणों) में ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की इस सर्वोपरि एकादशी की पावन कथा का आरंभ धर्मराज युधिष्ठिर और लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के संवाद से होता है ।

एक समय की बात है, नैमिषारण्य के पवित्र तीर्थ में शौनक आदि अठासी हजार ऋषियों के समक्ष परम ज्ञानी सूत जी महाराज कथा का वर्णन कर रहे थे। सूत जी ने कहा - "हे शौनक आदि ऋषियों! प्राचीन काल में पाण्डवों के ज्येष्ठ भ्राता, सत्य और धर्म के प्रतीक धर्मराज युधिष्ठिर ने लीला पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण से एकादशी व्रत के विषय में प्रश्न किया।"

धर्मराज युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर अत्यंत विनम्रता से कहा - "हे जनार्दन! हे त्रिलोकीनाथ! हे माधव! आपने कृपा करके मुझे वैशाख मास के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की एकादशियों का अत्यंत सुंदर माहात्म्य सुनाया। हे प्रभु! अब कृपा करके मुझे ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, उसका क्या नाम है, उसका क्या माहात्म्य है और उसकी कथा क्या है, यह विस्तारपूर्वक बतलाइए। मैं आपके श्रीमुख से इस पावन कथा को सुनने का अभिलाषी हूँ।"

भगवान श्रीकृष्ण ने मुस्कुराते हुए युधिष्ठिर की ओर देखा और कहा - "हे राजन्! एकादशी का व्रत समस्त दुःखों और त्रिविध तापों से मुक्ति दिलाने वाला है। यह हजारों यज्ञों के अनुष्ठान के समान पुण्य देने वाला और चारों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) को सहज ही प्रदान करने वाला है । परंतु हे युधिष्ठिर! इस ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का वर्णन परम ज्ञानी, वेदों के विस्तारकर्ता और आपके पितामह महर्षि वेदव्यास जी करेंगे। क्योंकि वे सम्पूर्ण शास्त्रों के ज्ञाता हैं और साक्षात् मेरे ही स्वरूप हैं।"

उसी समय भगवान की इच्छा से वहां पर परम तपस्वी महर्षि वेदव्यास जी का आगमन हुआ। सभी पाण्डवों—युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव—तथा भगवान श्रीकृष्ण ने उठकर महर्षि वेदव्यास जी का सत्कार किया और उन्हें उच्च एवं पवित्र आसन पर आसीन किया। धर्मराज युधिष्ठिर ने हाथ जोड़कर व्यास जी से विनम्र निवेदन किया。

युधिष्ठिर बोले - "हे परम प्राज्ञ पितामह! भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा से मैं आपसे ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी का विधान और कथा सुनना चाहता हूँ। यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो कृपा करके मुझे इस उत्तम व्रत का उपदेश दीजिए, जिससे मनुष्य जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष को प्राप्त कर सके।"


तृतीय अध्याय: महर्षि व्यास का उपदेश एवं महाबली भीमसेन का निवेदन

धर्मराज युधिष्ठिर के वचन सुनकर महर्षि वेदव्यास जी ने एकादशी के सामान्य नियमों का वर्णन करते हुए कहा - "हे धर्मराज! जो मनुष्य स्वर्ग लोक जाने की इच्छा रखते हैं, उन्हें जीवन भर इस व्रत का पालन करना चाहिए। परिवार में जन्म या मृत्यु के कारण लगने वाले सूतक या पातक के समय (अशौच अवस्था में) भी एकादशी के दिन अन्न कदापि ग्रहण नहीं करना चाहिए। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जो पापी हैं, दुराचारी हैं, अत्यंत पाप कर्म करने वाले हैं और धर्म से विहीन हैं, वे भी यदि एकादशी के दिन अन्न नहीं खाते, तो वे भगवान विष्णु के सामीप्य को प्राप्त कर लेते हैं।"

महर्षि वेदव्यास जी एकादशी के इन नियमों का वर्णन कर ही रहे थे कि वहां उपस्थित महाबली भीमसेन अत्यंत व्याकुल हो उठे। उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर अपने पितामह व्यास जी से अपना कष्ट निवेदित किया। भीमसेन और व्यास जी का यह ऐतिहासिक संवाद ही निर्जला एकादशी की मूल कथा है, जिसके कारण इसे संसार में 'भीमसेनी एकादशी' कहा जाता है ।

पद्म पुराण के अनुसार महाबली भीमसेन ने व्यास जी से कहा: "पितामह मेधाविन् शृणु मे वचनं महत्। युधिष्ठिरश्च कुन्ती च द्रौपदी चार्जुनस्तथा॥ नकुलः सहदेवश्च उपवासं कुर्वन्ति वै। मां च वदन्ति सर्वे वै एकादश्यां न भुञ्जताम्॥"

अर्थात - "हे परम बुद्धिमान पितामह! मेरी एक अत्यंत महत्वपूर्ण और गंभीर बात सुनिए। मेरे ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर, मेरी आदरणीय माता कुंती, मेरी पत्नी द्रौपदी, भ्राता अर्जुन, नकुल और सहदेव—ये सभी अत्यंत श्रद्धापूर्वक एकादशी का उत्तम व्रत करते हैं और उस दिन पूर्णतः उपवास रखते हैं। वे सभी मुझसे भी निरंतर यही कहते हैं कि 'हे भीम! तुम भी एकादशी के दिन अन्न ग्रहण मत किया करो'।"

भीमसेन ने अपनी विवशता प्रकट करते हुए आगे कहा: "तान् ब्रवीमि पितामह! नाहं शक्तोऽस्मि नोपवासे। वृको नाम्नाग्निः सदा मे जठरे तिष्ठति॥ स च शाम्यति बहुधा मे भुञ्जानस्य। तस्मादेकं व्रतं तात! यत्कृत्वा स्वर्गमाप्नुयाम्॥"

अर्थात - "हे तात! मैं उन सभी से यही कहता हूँ कि मेरे लिए भूख को सहन कर पाना अत्यंत कठिन है। मैं दिन में एक बार भोजन करके भी निर्वाह नहीं कर सकता, तो फिर मेरे लिए पूर्ण उपवास करना कैसे संभव है? हे मुनिवर! मेरे उदर (पेट) में 'वृक' नामक एक अत्यंत तीव्र अग्नि निरंतर प्रज्वलित रहती है। जब मैं बहुत अधिक मात्रा में अन्न का भक्षण करता हूँ, तभी वह भयंकर अग्नि शांत होती है। यदि मैं अन्न न खाऊँ, तो वह वृक नामक अग्नि मेरी देह की चर्बी को ही चाटने लगती है। इसलिए हे महर्षि! मैं प्रत्येक पक्ष की एकादशी का उपवास करने में सर्वथा असमर्थ हूँ। हर पंद्रह दिन में आने वाली एकादशी के कारण मेरे घर में झगड़ा होता है क्योंकि मैं भूख सहन नहीं कर सकता।"

"मैं उस व्रत का पूर्ण विधि-विधान से पालन अवश्य करूँगा, जिससे स्वर्ग की प्राप्ति होती हो। अतः आप मुझे कोई ऐसा एक ही उपाय या व्रत बताएँ जिससे 'सांप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे'। अर्थात्, जिसे वर्ष में केवल एक ही बार करना पड़े और जिसके करने से मुझे स्वर्ग लोक तथा भगवान विष्णु की प्राप्ति हो जाए।"

भीमसेन की इस व्याकुलता को सुनकर महर्षि वेदव्यास जी ने गंभीर स्वर में कहा - "हे वायुपुत्र भीम! यदि तुम नरक को बुरा मानते हो और तुम्हें स्वर्ग लोक की अभिलाषा है, तो तुम्हें प्रत्येक मास की दोनों एकादशियों (शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष) के दिन अन्न कदापि नहीं खाना चाहिए। जो मनुष्य एकादशी के दिन अन्न खाता है, वह पाप का ही भक्षण करता है। ऐसे लोग चांडाल के समान समझे जाते हैं और अंत में भयंकर नरक में जाते हैं।"

व्यास जी के मुख से नरक की यातनाओं और पाप के इन कठोर वचनों को सुनकर महापराक्रमी भीमसेन अत्यंत भयभीत हो गए। पद्म पुराण में वर्णन आता है: "तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्तु काँपमानोऽश्वत्थपत्रवत्।"

अर्थात - महर्षि व्यास जी के वचनों को सुनकर महाबली भीमसेन पीपल के पत्ते के समान कांपने लगे। उन्होंने भयभीत होकर अपने गुरु और पितामह व्यास जी के चरणों में गिरकर पुनः प्रार्थना की。

भीमसेन बोले - "हे पितामह! अब मैं क्या करूँ? मैं तो भूख के मारे प्राण त्याग दूँगा, किंतु हर माह उपवास नहीं कर पाऊँगा। मैं वर्ष भर में केवल एक ही दिन पूर्ण उपवास कर सकता हूँ। अतः आप कृपा करके मेरे लिए कोई ऐसा व्रत निश्चित कीजिए, जिसके करने मात्र से मेरा उद्धार हो जाए और मुझे वर्ष भर की सभी एकादशियों का पुण्य फल प्राप्त हो जाए।"

एकादशी कथा के प्रमुख पात्र एवं उनका विवरण

पारंपरिक कथा में वर्णित पात्रों की स्थिति को इस प्रकार समझा जा सकता है:

पात्र का नाम कथा में भूमिका एवं स्थिति व्रत के प्रति आचरण
महर्षि वेदव्यास पाण्डवों के पितामह, पुराणों के रचयिता भीमसेन को निर्जला एकादशी का उपदेश देने वाले
धर्मराज युधिष्ठिर पाण्डवों के ज्येष्ठ भ्राता भगवान श्रीकृष्ण से एकादशी का माहात्म्य पूछने वाले
भीमसेन (वृकोदर) वायुपुत्र, द्वितीय पाण्डव 'वृक' अग्नि के कारण भूख सहन न कर पाने वाले
माता कुंती पाण्डवों की माता प्रत्येक एकादशी का कठोरता से पालन करने वाली
द्रौपदी पाण्डवों की पत्नी पूर्ण निष्ठा के साथ प्रत्येक एकादशी का व्रत रखने वाली
अर्जुन, नकुल, सहदेव अन्य पाण्डव भ्राता एकादशी के दिन पूर्ण उपवास का नियम निभाने वाले

चतुर्थ अध्याय: निर्जला एकादशी का उपदेश एवं व्रत-विधान

भीमसेन की अत्यंत कातर और करुण प्रार्थना सुनकर महर्षि वेदव्यास जी ने अत्यंत करुणापूर्वक कहा - "हे भद्र! हे वृकोदर! तुम चिंता मत करो। वृषभ और मिथुन संक्रांति के मध्य, ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष में जो एकादशी आती है, तुम उसका निर्जल व्रत करो। इस एकादशी का नाम 'निर्जला एकादशी' है।"

व्यास जी ने इस अत्यंत कठोर व्रत के नियम स्पष्ट करते हुए कहा - "हे भीम! इस एकादशी के व्रत में अन्न ग्रहण करना तो सर्वथा वर्जित है ही, साथ ही जल का प्रयोग भी पूर्णतः निषिद्ध है। इसमें केवल स्नान और भगवान के पूजन के समय आचमन के लिए जल का प्रयोग किया जा सकता है। आचमन करते समय भी इस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए कि जल की मात्रा 'छः मासे' (अर्थात एक सरसों के दाने को डुबोने भर या मात्र छह बूंद) से अधिक न हो। यदि आचमन में इससे अधिक जल ग्रहण किया जाता है, तो वह मदिरा पान के समान दोषपूर्ण माना जाता है।"

"इस व्रत का संकल्प दशमी तिथि की संध्या को ही ले लेना चाहिए। एकादशी के सूर्योदय से लेकर द्वादशी के सूर्योदय तक पूर्ण रूप से निर्जल और निराहार रहना अनिवार्य है। इस अवधि में किसी भी प्रकार का आहार या जल ग्रहण करने से व्रत खंडित हो जाता है। हे कुंतीपुत्र! यदि तुम केवल इस एक दिन इस कठोर व्रत का पालन कर लोगे, तो तुम्हें वर्ष भर की सभी चौबीस एकादशियों (अधिक मास होने पर छब्बीस एकादशियों) के उपवास का पूर्ण फल एक ही दिन में प्राप्त हो जाएगा।"

वर्ष की चौबीस एकादशियाँ जिनका फल प्राप्त होता है

व्यास जी ने भीमसेन को जिन २४ एकादशियों के पुण्य का फल एक ही निर्जला एकादशी से प्राप्त होने का उपदेश दिया, उनका पारंपरिक क्रम इस प्रकार है :

मास कृष्ण पक्ष की एकादशी शुक्ल पक्ष की एकादशी
चैत्र पापमोचनी एकादशी कामदा एकादशी
वैशाख वरुथिनी एकादशी मोहिनी एकादशी
ज्येष्ठ अपरा एकादशी निर्जला एकादशी (भीमसेनी)
आषाढ़ योगिनी एकादशी देवशयनी एकादशी
श्रावण कामिका एकादशी पुत्रदा (पवित्रा) एकादशी
भाद्रपद अजा एकादशी परिवर्तिनी (पार्श्व) एकादशी
आश्विन इन्दिरा एकादशी पापांकुशा एकादशी
कार्तिक रमा एकादशी प्रबोधिनी (देवउठनी) एकादशी
मार्गशीर्ष उत्पन्ना एकादशी मोक्षदा एकादशी
पौष सफला एकादशी पुत्रदा एकादशी
माघ षटतिला एकादशी जया एकादशी
फाल्गुन विजया एकादशी आमलकी एकादशी

(टिप्पणी: अधिक मास होने पर पद्मिनी और परमा एकादशी का फल भी इसी व्रत से प्राप्त होता है।)

व्यास जी ने आगे कहा - "द्वादशी के दिन सूर्योदय से पूर्व, ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत्त होना चाहिए। तदुपरांत देवेश्वर भगवान श्रीहरि (त्रिविक्रम स्वरूप) का गंध, पुष्प, धूप, दीप और सुंदर वस्त्रों से विधिपूर्वक षोडशोपचार पूजन करना चाहिए।"

कलश दान का पारंपरिक मंत्र एवं पारण-विधि

पद्म पुराण और एकादशी माहात्म्य की कथा में महर्षि व्यास ने जल-कुम्भ (घड़े) के दान का विधान बताते हुए जो मंत्र पारंपरिक रूप से पढ़ने का निर्देश दिया, वह इस प्रकार है:

देवदेव हृषीकेश संसारार्णवतारक।
उदकुम्भप्रदानेन नय मां परमां गतिम्॥

अर्थात - "हे देवों के देव! हे इंद्रियों के स्वामी हृषीकेश! हे संसार रूपी भवसागर से पार उतारने वाले प्रभु! जल से भरे हुए इस कलश के दान से आप मुझे परम गति (मोक्ष) की प्राप्ति कराइए।"

व्यास जी ने पुनः कहा - "हे भीमसेन! जल से भरे हुए घड़े को वस्त्र से ढककर, संभव हो तो स्वर्ण सहित किसी सुपात्र श्रेष्ठ ब्राह्मण को दान करना चाहिए । इस दिन पितरों और देवताओं की प्रसन्नता के लिए ब्राह्मणों को शक्कर के साथ जल के घड़े दान करने चाहिए। दान करने के पश्चात ब्राह्मणों को मिष्ठान और भोजन कराना चाहिए, उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार दक्षिणा देनी चाहिए। अन्न, वस्त्र, छाता, जूते, गौ और शय्या आदि का दान अपनी सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। इसके पश्चात सभी को विदा करके, स्वयं भगवान का चरणामृत लेकर और मौन रहकर व्रत का पारण (भोजन) करना चाहिए।"


पंचम अध्याय: कथा का द्वितीय पारंपरिक पाठ (ब्रह्मवैवर्त पुराण परंपरा)

पारंपरिक कथा वाचन में, पद्म पुराण के संवाद के पश्चात ब्रह्मवैवर्त पुराण और लोक-परंपरा में प्रचलित भीमसेन के व्रत-पालन का वह प्रसंग भी सुनाया जाता है, जो गीता प्रेस की 'एकादशी व्रत कथा' पुस्तक में सविस्तार वर्णित है ।

कथा के इस भाग में बताया जाता है कि महर्षि वेदव्यास जी की आज्ञा मानकर भीमसेन ने इस कठिन 'निर्जला एकादशी' का व्रत धारण करने का संकल्प लिया। यद्यपि भीमसेन के लिए एक पल भी भूखा रहना असंभव था, परंतु गुरुजनों के प्रति श्रद्धा और भगवान वासुदेव के प्रति अगाध भक्ति-भाव के कारण उन्होंने दृढ़ निश्चय किया ।

ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की भीषण गर्मी का समय था। सूर्य अपनी पूर्ण तपिश पर था और वातावरण में अग्नि बरस रही थी। ऐसे में भीमसेन ने दशमी की रात्रि से ही अन्न और जल का त्याग कर दिया। जैसे-जैसे एकादशी का दिन चढ़ने लगा, भीमसेन के शरीर में विद्यमान 'वृक' नामक अग्नि अन्न और जल के अभाव में प्रचंड होने लगी。

दिन भर तो भीमसेन ने किसी प्रकार 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का निरंतर जप करते हुए समय व्यतीत किया । उन्होंने मौन धारण कर लिया क्योंकि बोलने से प्यास अधिक लगती है और शरीर में जल की कमी अनुभव होती है । परंतु रात्रि होते-होते उनकी प्यास और भूख असह्य हो गई। उनका विशाल शरीर भूख और प्यास की व्याकुलता के कारण शिथिल पड़ने लगा। ग्रीष्म ऋतु की उस भयंकर रात्रि में भीमसेन मूर्छित होने की अवस्था में आ गए。

कथा में प्रसंग आता है कि रात्रि के समय जब उनसे गर्मी और प्यास सहन नहीं हुई, तब उन्होंने अपने पैर के प्रहार से धरती से जल की धारा प्रकट की, परंतु उन्होंने अपने व्रत को खंडित नहीं किया और जल की एक बूंद भी नहीं पी । उन्होंने अपनी प्रतिज्ञा को टूटने नहीं दिया。

अगले दिन द्वादशी को प्रातः काल होते-होते महाबली भीमसेन पूर्णतः संज्ञाहीन (बेहोश) होकर पृथ्वी पर गिर पड़े। जब महाराज युधिष्ठिर, माता कुंती, द्रौपदी और अर्जुन आदि ने भीमसेन को मूर्छित अवस्था में देखा, तो वे अत्यंत चिंतित हो गए। तब सभी पाण्डवों ने मिलकर भगवान श्रीहरि का पवित्र चरणामृत, गंगाजल और तुलसी-दल भीमसेन के मुख में डाला। भगवान के उस पवित्र चरणामृत के प्रभाव से भीमसेन की मूर्छा दूर हुई और उन्हें चेतना प्राप्त हुई ।

तदुपरांत भीमसेन ने विधि-विधान से ब्राह्मणों को आमंत्रित किया। उन्होंने शर्करा (शक्कर) मिश्रित जल से भरे हुए अनेक स्वर्ण और मिट्टी के कलशों का दान किया। पितरों और देवताओं के निमित्त पंखा, छाता, कपड़े के जूते, वस्त्र और गौ का दान किया । अंत में ब्राह्मणों को सुस्वादु भोजन कराकर, दक्षिणा देकर उनका आशीर्वाद प्राप्त किया और उसके बाद स्वयं भोजन करके अपने इस महाव्रत का पारण किया。

भीमसेन द्वारा अत्यंत साहस और निष्ठा के साथ इस सर्वोत्कृष्ट और सबसे कठिन एकादशी का व्रत किए जाने के कारण ही, इस एकादशी का नाम संसार में 'भीमसेनी एकादशी' और 'पाण्डव एकादशी' अथवा 'पाण्डव द्वादशी' के नाम से विख्यात हो गया । भगवान विष्णु भीमसेन की इस निष्ठा से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने भीमसेन को उनके सभी पूर्व जन्मों और इस जन्म के पापों से मुक्त कर दिया。


षष्ठ अध्याय: व्रत की पारंपरिक फलश्रुति एवं माहात्म्य (व्यास जी द्वारा वर्णित)

पारंपरिक कथा के अंत में महर्षि वेदव्यास द्वारा बताई गई इस व्रत की जो विस्तृत फलश्रुति (पुण्य फल का वर्णन) सुनाई जाती है, वह पूर्ण रूप में इस प्रकार है:

व्यास जी ने कहा - "हे भीम! जो मनुष्य श्रद्धा और भक्ति-भाव से इस निर्जला एकादशी का व्रत करता है, उसे वर्ष भर में आने वाली सभी चौबीस एकादशियों का फल केवल इसी एक दिन के व्रत से प्राप्त हो जाता है। इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।"

हरिभक्तिविलास और पद्म पुराण में भगवान केशव के वचन हैं: "संवत्सरस्य या मध्ये एकादश्यो भवन्ति हि। तासां फलं अवाप्नोति पुत्र मे नात्र संशयः॥" अर्थात - "हे पुत्र! वर्ष भर में जितनी भी एकादशियाँ आती हैं, उन सभी का फल इस एक निर्जला एकादशी के व्रत से प्राप्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।"

"जो व्यक्ति इस दिन अन्न ग्रहण करते हैं, वे चांडाल के समान माने गए हैं और वे आत्मद्रोही (स्वयं का नाश करने वाले) हैं। वे अंत में भयंकर नरक की यातना भोगते हैं । परंतु जो मनुष्य इस दिन पूर्ण रूप से निर्जल रहकर उपवास करते हैं, वे चाहे कितने भी बड़े पापी क्यों न हों, यदि उन्होंने ब्रह्म-हत्या की हो, मदिरा पान किया हो, चोरी की हो, गुरु-पत्नी गमन किया हो या गुरु से ईर्ष्या-द्वेष किया हो, तो भी वे इस निर्जला एकादशी के प्रभाव से सभी घोर पापों से मुक्त होकर स्वर्ग लोक को प्राप्त करते हैं।"

"इस दिन भगवान विष्णु का ध्यान करते हुए रात्रि जागरण करने का विशेष महत्व है। जो मनुष्य इस एकादशी की रात्रि में भगवान के पवित्र नामों का जप, कीर्तन और उनकी कथा का श्रवण करते हुए जागरण करता है, वह अपने पितृ-कुल की दस पीढ़ियों, मातृ-कुल की दस पीढ़ियों और पत्नी-कुल की दस पूर्व पीढ़ियों का निश्चय ही उद्धार कर देता है और उन्हें विष्णु लोक में स्थान दिलाता है।"

"हे कुंतीपुत्र! मृत्यु के समय सामान्य मनुष्यों के पास यमराज के भयंकर यमदूत पाश और दंड लेकर प्राण निकालने आते हैं, परंतु जो व्यक्ति इस देवव्रत 'निर्जला एकादशी' का व्रत करता है, उसके अंतिम समय में यमदूत कभी उसके पास नहीं फटकते। इसके विपरीत, भगवान श्रीहरि के पीताम्बर धारी, चतुर्भुज पार्षद (विष्णुदूत या वसु-दूत) अपने हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म लिए पुष्पक विमान में बैठकर आते हैं और उस पुण्यात्मा को ससम्मान वैकुण्ठ लोक (विष्णु लोक) ले जाते हैं।"

"इस पवित्र दिन पर कुरुक्षेत्र आदि तीर्थों में स्नान करने, करोड़ों गायों का दान करने, सुवर्ण का दान करने या अश्वमेध और वाजपेय जैसे महान यज्ञ करने से जो फल प्राप्त होता है, वह फल निर्जला एकादशी के मात्र एक उपवास की सोलहवीं कला के बराबर भी नहीं है। यह व्रत समस्त तीर्थों और दानों से बढ़कर है।"


सप्तम अध्याय: पारंपरिक उपसंहार, एकादशी माता की आरती एवं क्षमा प्रार्थना

कथा के पारंपरिक समापन में यह उद्घोष किया जाता है:

"हे भीम! जो पुरुष या स्त्री इस पावन निर्जला एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत करते हैं, और जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस दिन इस 'भीमसेनी एकादशी' की यह पौराणिक कथा पढ़ते या सुनते हैं, उन्हें निश्चय ही भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है और वे अंत काल में वैकुण्ठ धाम को प्राप्त करते हैं।"

कथा के पूर्ण होने पर सभी भक्तजन अपने स्थान पर खड़े होकर सम्मिलित स्वर में भगवान श्रीहरि विष्णु और एकादशी माता की पारंपरिक आरती का गायन करते हैं, जो लोक-परंपरा और गीता प्रेस की पुस्तकों में विहित है:

एकादशी माता की आरती

ॐ जय एकादशी माता, मैया जय एकादशी माता।
विष्णु पूजा व्रत को धारण, कर शक्ति मुक्ति पाता॥ ॐ जय...॥


तेरे नाम खुले हैं भाग्य, जो कोई तुझे ध्याता।
मनवांछित फल पावे, पातक कट जाता॥ ॐ जय...॥


तेरे नाम से पापी भी, वैकुण्ठ में जाता।
पाप सभी मिट जाते, शुद्ध हो जाता॥ ॐ जय...॥


मार्गशीर्ष में जो कोई, एकादशी करता।
सदा सुखी वह रहता, दुख नहिं पाता॥ ॐ जय...॥


पौष मास में जो व्रत करता, मोह नाहिं आता।
विष्णु लोक में जाकर, सदा सुख पाता॥ ॐ जय...॥


माघ मास की एकादशी को, जो कोई है करता।
सभी पाप कट जाते, कभी न दुख पाता॥ ॐ जय...॥


फाल्गुन मास की एकादशी, महा पुण्य दाता।
विष्णु लोक को जावे, कभी न फिर आता॥ ॐ जय...॥


चैत्र मास में एकादशी, जो कोई नर करता।
मन के कलुष मिटाकर, शुद्ध हो जाता॥ ॐ जय...॥


वैशाख मास एकादशी को, नियम जो करता।
सभी देव प्रसन्न हों, पाप कट जाता॥ ॐ जय...॥


ज्येष्ठ मास की निर्जला, जो कोई है करता।
चौबीस एकादशी का, वह फल है पाता॥ ॐ जय...॥


आषाढ़ मास में जो कोई, शयनी व्रत करता।
चतुर्मास जो करता, वह फल है पाता॥ ॐ जय...॥


श्रावण मास एकादशी, जो कोई नर करता।
उसका जन्म सुधरता, स्वर्ग को जाता॥ ॐ जय...॥


भाद्रपद की एकादशी, जो कोई है करता।
परिवर्तिनी जो करता, कभी न दुख पाता॥ ॐ जय...॥


आश्विन मास एकादशी, जो कोई नर करता।
पापांकुशा जो करता, पाप कट जाता॥ ॐ जय...॥


कार्तिक मास प्रबोधिनी, जो कोई नर करता।
उसका भाग्य संवरता, स्वर्ग को जाता॥ ॐ जय...॥


एकादशी की आरती, जो कोई नर गाता।
कहत शिवानंद स्वामी, मनवांछित फल पाता॥

ॐ जय एकादशी माता, मैया जय एकादशी माता॥

क्षमा प्रार्थना (कथा समापन मंत्र)

आरती के पश्चात भक्तगण हाथ में जल और पुष्प लेकर भगवान से कथा वाचन, श्रवण और व्रत में हुई त्रुटियों के लिए क्षमा मांगते हैं और भगवान को अपना व्रत समर्पित करते हैं:

आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम्।
पूजां चैव न जानामि क्षमस्व परमेश्वर॥
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं जनार्दन।
यत्पूजितं मया देव परिपूर्णं तदस्तु मे॥

"हे परमेश्वर! मैं ना तो आपका आवाहन करना जानता हूँ, ना विसर्जन करना जानता हूँ और ना ही पूजा की विधि जानता हूँ। मुझसे जो भी भूल-चूक हुई हो, उसे क्षमा करें। हे जनार्दन! मेरा यह व्रत और यह कथा-पाठ मंत्रहीन, क्रियाहीन और भक्तिहीन हो सकता है, परंतु हे प्रभु! आप इसे अपनी दया से पूर्ण मानकर मुझे अपनी शरण में लें।"

"बोलिए श्री एकादशी माता की जय!"

"बोलिए श्री लक्ष्मीनारायण भगवान की जय!"

"श्री वेदव्यास जी महाराज की जय!"

"धर्म की जय हो, अधर्म का नाश हो!"

"प्राणियों में सद्भावना हो, विश्व का कल्याण हो!"

"गौ माता की जय हो!"

"ॐ नमः पार्वती पते, हर हर महादेव!"

(इति श्री पद्मपुराणे उत्तरखण्डे युधिष्ठिर-व्यास-भीमसेन सम्वादे ज्येष्ठशुक्ल-निर्जला-भीमसेनी-एकादशी-व्रत-कथा माहात्म्यं सम्पूर्णम्)

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