विस्तृत उत्तर
सनातन धर्म की काल-गणना में दिन और रात्रि के मिलन (संध्या) के कालखंड को 'प्रदोष' कहा जाता है। 'प्रदोष' शब्द का अर्थ है—दोषों का शमन करने वाला काल। आध्यात्मिक दृष्टि से, यह 'प्रकाश' (ज्ञान/चेतना) और 'अंधकार' (अज्ञान/माया) के बीच संघर्ष और संतुलन का क्षण है। स्कंद पुराण के अनुसार प्रत्येक पक्ष (शुक्ल और कृष्ण) की त्रयोदशी तिथि को संध्या काल में स्वयं भगवान आशुतोष (शिव) कैलाश पर्वत पर तांडव नृत्य करते हैं, जिसका उद्देश्य सृष्टि में व्याप्त नकारात्मक ऊर्जाओं, पापों और असंतुलन को नष्ट करना है। शिव 'महाकाल' होकर भी प्रदोष काल में समय के भीतर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते हैं, इसलिए यह शिव-सायुज्य (शिव के साथ एकरूपता) प्राप्ति का सर्वश्रेष्ठ समय है।





