विस्तृत उत्तर
केतु (पूंछ) अतीत के कर्म-बंधन, मोक्ष की छटपटाहट और वैराग्य का प्रतीक है।
जब जीवन के सभी क्षेत्र (ग्रह) इन दो ध्रुवों के बीच फँस जाते हैं, तो व्यक्ति का जीवन 'अतृप्त-इच्छा' (राहु) और 'कर्म-बंधन' (केतु) के बीच पिसता रहता है। वह न तो पूर्ण रूप से भौतिक हो पाता है और न ही पूर्ण रूप से आध्यात्मिक।
यह द्वंद्व ही 'जीवन-अस्थिरता', भ्रम और मानसिक अशांति का मूल कारण है।





