विस्तृत उत्तर
ज्योतिषीय दृष्टि से, कालसर्प दोष राहु (सर्प का मुख) और केतु (सर्प की पूंछ) के मध्य अन्य सात ग्रहों के फँस जाने से बनता है।
नाग (विशेष रूप से राहु और केतु) 'काल' के दण्ड-अधिकारी (कर्म-फल के प्रवर्तक) माने जाते हैं।
राहु और केतु ही सूर्य (पिता का कारक) और चंद्रमा (माता का कारक) को ग्रहण लगाते हैं, जो पितृदोष से भी गहरा संबंध स्थापित करता है।





