विस्तृत उत्तर
ज्योतिष शास्त्र में 'कालसर्प योग' को एक ऐसी ग्रह-स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया है, जहाँ जन्म-कुंडली के समस्त ग्रह, छाया-ग्रह राहु एवं केतु के मध्य (एक ओर) स्थित हो जाते हैं।
ज्योतिषीय दृष्टि से, यह दोष राहु (सर्प का मुख) और केतु (सर्प की पूंछ) के मध्य अन्य सात ग्रहों के फँस जाने से बनता है।
यह स्थिति एक 'नाग-पाश' (सर्प-बंधन) के रूप में देखी जाती है।





