विस्तृत उत्तर
ज्योतिष शास्त्र में 'कालसर्प योग' को एक ऐसी ग्रह-स्थिति के रूप में परिभाषित किया गया है, जहाँ जन्म-कुंडली के समस्त ग्रह, छाया-ग्रह राहु एवं केतु के मध्य (एक ओर) स्थित हो जाते हैं।
यह स्थिति, जिसे एक 'नाग-पाश' (सर्प-बंधन) के रूप में देखा जाता है, प्रायः जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अप्रत्याशित बाधाओं, संघर्ष, मानसिक अस्थिरता और बनते हुए कार्यों में विघ्न के रूप में प्रकट होती है।
यह केवल ग्रहों की स्थिति मात्र नहीं है, अपितु यह एक गहन आध्यात्मिक और कार्मिक अवस्था का द्योतक है, जो बहुधा पूर्वजन्म के कर्मों अथवा पितृ-शाप से संबंधित होती है।





