विस्तृत उत्तर
पूजा में दीपक जलाने का आध्यात्मिक अर्थ अत्यंत गहरा है। दीपक केवल एक ज्योति नहीं — यह परमज्ञान, दिव्य उपस्थिति और अंधकार के नाश का प्रतीक है।
शास्त्रों में दीपक को 'ब्रह्म का स्वरूप' कहा गया है — 'दीपो ज्योति परब्रह्म दीपो ज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं संध्यादीप नमोऽस्तुते।।' — दीपक ज्योति ब्रह्म है, दीपक ज्योति जनार्दन (विष्णु) है, दीपक मेरे पापों को हरे।
दीपक के आध्यात्मिक प्रतीक इस प्रकार हैं — दीपक का तेल या घी अहंकार और वासनाओं का प्रतीक है जो जलकर समाप्त होता है। बाती जीवात्मा का प्रतीक है। और दीपक की लौ परमात्मा की अनंत ज्योति का प्रतीक है। जब साधक दीपक जलाता है तो प्रतीकात्मक रूप से वह अपने अहंकार को घटाकर परमात्मा की ओर बढ़ता है।
व्यावहारिक रूप से दीपक की ज्योति वातावरण को शुद्ध करती है, नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है और पूजास्थल में दिव्य तरंगें उत्पन्न होती हैं। घी के दीपक में तेज प्रकाश और दिव्य सुगंध होती है — यह देवताओं को अत्यंत प्रिय है।
दीपक की दिशा का भी महत्व है — पूर्व दिशा में दीपक जलाने से आयु वृद्धि और उत्तर दिशा में धन-लाभ होता है। घी का दीपक भगवान को और तेल का दीपक मनोकामना पूर्ति के लिए जलाया जाता है।





