विस्तृत उत्तर
यह समझना आवश्यक है कि द्रव्य शुद्धि (पदार्थ की पवित्रता) और भाव शुद्धि (आंतरिक निष्ठा) एक-दूसरे से पृथक नहीं, अपितु परस्पर आश्रित हैं।
जब कोई साधक ईश्वर की आराधना के लिए स्वर्ण जैसी दिव्य उत्पत्ति वाली धातु का प्रयोग करता है, तो उस धातु का सात्विक स्पंदन स्वतः ही साधक के भावों को उन्नत और निर्मल करता है।
इसी प्रकार, जिसके अंतःकरण में शुद्ध भाव और सच्ची श्रद्धा होती है, वह अपनी पूजा के लिए सहज ही शास्त्र-सम्मत और शुद्ध द्रव्यों का ही चयन करता है।
इस प्रकार, शुद्ध भाव और शुद्ध द्रव्य का संयोग एक ऐसा पवित्र ऊर्जा क्षेत्र निर्मित करता है, जिसमें दैवीय कृपा का अवतरण अवश्यंभावी हो जाता है।





