विस्तृत उत्तर
किन्तु, हमें यह सदैव स्मरण रखना चाहिए कि ये सभी साधन और विधियां तभी फलित होती हैं, जब इनके मूल में भक्त की सच्ची श्रद्धा और निर्मल भाव हो।
शास्त्रों में 'भाव शुद्धि' को 'द्रव्य शुद्धि' से भी ऊपर स्थान दिया गया है।
बिना श्रद्धा और विश्वास के, स्वर्ण का श्रीयंत्र भी एक साधारण रेखाचित्र के समान है और अष्टधातु की प्रतिमा भी पाषाण-तुल्य है।
परमात्मा भाव के भूखे हैं, वैभव के नहीं।





