विस्तृत उत्तर
स्थायी भक्ति मिलने का क्रम बताया गया है। पवित्र तीर्थों के सेवन से महात्मा सेवा मिलती है, महात्मा सेवा से भगवान की कथा सुनने की इच्छा होती है, फिर श्रद्धा आती है और अंत में भगवत कथा में रुचि पैदा होती है। भगवान कृष्ण की कथा सुनने वालों के हृदय में स्वयं कृष्ण स्थित होकर अशुभ वासनाओं को दूर करते हैं। जब श्रीमद्भागवत या भगवद्कथा के निरंतर सेवन से ये अशुभ वासनाएँ नष्ट हो जाती हैं, तब पवित्र कीर्ति वाले भगवान कृष्ण के प्रति स्थायी प्रेम की प्राप्ति होती है। इसलिए स्थायी भक्ति अचानक नहीं आती; वह सत्संग, सेवा, श्रद्धा, कथा-श्रवण और निरंतर भागवत सेवन से हृदय शुद्ध होने पर प्रकट होती है।
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