विस्तृत उत्तर
शास्त्रों का यह अकाट्य सिद्धांत है कि 'शुद्धि के बिना सिद्धि संभव नहीं है'।
किसी भी साधना अथवा अनुष्ठान की सफलता के लिए सप्त-शुद्धि अनिवार्य बताई गई है, जिनमें 'द्रव्य शुद्धि' (पदार्थों की पवित्रता) का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
अशुद्ध, दोषयुक्त अथवा अनुचित द्रव्य से किया गया अनुष्ठान उसी प्रकार निष्फल हो जाता है, जैसे अपवित्र पात्र में रखा गया गंगाजल।





