विस्तृत उत्तर
वायु पुराण और वेदांत दर्शन में भुवर्लोक को प्रज्ञा और प्राण का समन्वय माना गया है जिसे 'प्राण-मनस' कहते हैं। इस अवधारणा का अर्थ यह है कि भुवर्लोक न तो पूर्णतः स्थूल भौतिक जगत है (जैसे भूलोक) और न ही पूर्णतः आध्यात्मिक बुद्धि का क्षेत्र (जैसे उच्च लोक)। यह दोनों के बीच की कड़ी है जहाँ प्राण (जीवन ऊर्जा) और मन (चेतना) का संगम होता है। यहाँ की सत्ताओं का शरीर अन्नमय न होकर प्राण-मय और मनो-मय होता है। इसीलिए अष्टांग योग या हठ योग के साधक जब अपने प्राण (वायु) को वश में करते हैं तो वे भौतिक देह की सीमाओं को लांघकर मानसिक रूप से भुवर्लोक की सिद्धियों तक पहुँचने में सक्षम हो जाते हैं।
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