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वैदिक संस्कार📜 गरुड़ पुराण, कर्मकांड भास्कर, धर्मसिंधु, संस्कार परम्परा2 मिनट पठन

दसवां और तेरहवां कर्म कैसे करें?

संक्षिप्त उत्तर

दसवां: अशौच समाप्ति → क्षौर कर्म (मुंडन) → गृह शुद्धि (सफाई-पुताई) → तर्पण-पिण्डदान। तेरहवीं: पूर्ण श्राद्ध संस्कार → हवन → पंचयज्ञ → पिण्डदान → ब्राह्मण भोज → दान-दक्षिणा → शोक समाप्ति। क्षेत्रानुसार 12वें दिन भी।

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विस्तृत उत्तर

दाह संस्कार के बाद दसवें और तेरहवें दिन के कर्म अत्यंत महत्वपूर्ण मरणोत्तर संस्कार हैं:

दसवां कर्म (दशाह/शुद्धि दिवस)

  1. 1अशौच समाप्ति: दाह संस्कार से 10वें दिन अशौच (सूतक) समाप्त होता है। यह दिन 'शुद्धि दिवस' कहलाता है।
  1. 1क्षौर कर्म: मृतक के निकट सम्बन्धी (पुत्र, भाई आदि) क्षौर कर्म (मुंडन/बाल कटवाना) कराते हैं।
  1. 1गृह शुद्धि: घर की व्यापक सफाई — दीवारों की पुताई, जमीन की धुलाई-लिपाई, वस्त्रों की गर्म जल से धुलाई। मृत्यु से उत्पन्न अशुद्ध कीटाणुओं को दूर करना इसका व्यावहारिक उद्देश्य है।
  1. 1तर्पण-पिण्डदान: दसवें दिन तर्पण और पिण्डदान किया जाता है।
  1. 1दान: ब्राह्मणों को दान और भोजन कराने का विधान है।

तेरहवां कर्म (तेरहवीं/मरणोत्तर संस्कार)

  1. 1श्राद्ध संस्कार: तेरहवें दिन पूर्ण मरणोत्तर (श्राद्ध) संस्कार होता है। यह शोक-मोह की पूर्णाहुति का विधिवत आयोजन है।
  1. 1हवन: देवपूजन, तर्पण के साथ पंचयज्ञ (ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, पितृयज्ञ, भूतयज्ञ, मनुष्य यज्ञ) किया जाता है।
  1. 1पिण्डदान: विधिवत पिण्डदान दिया जाता है।
  1. 1ब्राह्मण भोज: ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। दान-दक्षिणा दी जाती है।
  1. 1वस्त्र-गौ दान: मृतक की आत्मा की शांति हेतु वस्त्र दान, गोदान, अन्नदान आदि किया जाता है।
  1. 1शोक समाप्ति: तेरहवीं के बाद सामान्य कर्तव्यों की ओर पुनः ध्यान देना आरम्भ करना चाहिए। शोक को 13 दिन से अधिक नहीं खींचना चाहिए।

क्षेत्रीय भिन्नता: कुछ क्षेत्रों में 12वें दिन ही तेरहवीं की विधि पूर्ण कर ली जाती है। कुछ परम्पराओं में 11वें दिन एकादशाह श्राद्ध और अलग से 13वें दिन कर्म होता है।

विशेष: इसके बाद मासिक श्राद्ध (प्रत्येक मास मृत्यु तिथि पर), सपिण्डी श्राद्ध, और वार्षिक श्राद्ध का क्रम चलता है। गया पिण्डदान अलग से किया जाता है।

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शास्त्रीय स्रोत
गरुड़ पुराण, कर्मकांड भास्कर, धर्मसिंधु, संस्कार परम्परा
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